MahaKumbh: 'पेन-नोटबुक बैग में रखें और घंटेभर पैदल भ्रमण करें', महाकुंभ में किसने रिपोर्टर को दी ये सलाह?
महाकुंभ की अनुपम छटा संगम की रेती पर बिखरी है जहां श्रद्धा आस्था और आत्मानुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। महाराष्ट्र से आए शिशिर गायकवाड़ जैसे तीर्थयात्री पैदल भ्रमण का आनंद लेते हुए मेला क्षेत्र की विविध कहानियों से सराबोर हो रहे हैं। पीपे के पुल भंडारे रैनबसेरे और स्वच्छता व्यवस्थाओं के साथ यह मेला केवल धार्मिक नहीं बल्कि मानवीयता और जीवन का उत्सव है।
पवन तिवारी, प्रयागराज। क्या देखने आए हैं...? वह भीड़ जिसकी थाह न ली जा सके? उस जनसमुद्र का प्रबंधन, जो केवल और केवल आत्मअनुशासन से नियंत्रित होती है? त्रिवेणी की अविरल, निर्मल धारा में समाहित अमृत घट की बूंदें? माघ मकरगत रबि के योग में देवता, दैत्य, किन्नर और मानव समूह का आगमन?
सनातन संरक्षा में रत 13 अखाड़ों के नागाओं, साधुओं, संतों, संन्यासियों के रहस्य का अनुपम आख्यान सुनने?
आह्हाहा...। इतना सबकुछ तो देखने-सुनने की उत्कंठा तो है ही, पर यहां आकर इससे इतर कुछ और आभास हो रहा। कुछ ऐसा जो मेरे लिए अवर्णनीय है। ठीक वैसे जैसा कि सूरदास जी कह गए हैं-
अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल को रस अन्तर्गत ही भावै॥
आशय समझ गए होंगे...जैसे वाणी से भाव प्रकट करने में अक्षम (गूंगे) व्यक्ति को मीठे फल का रस देकर स्वाद पूछें तो वह बता तो नहीं सकेंगे, लेकिन उस रस के आनंद से उनका अंतस भलीभांति आनंदित होता है, उसी प्रकार हम महाकुंभ के आनंद का वर्णन स्वमुख से कर पाने में समक्ष नहीं।
पैदल भ्रमण का सुझाव किसने दिया?
महाराष्ट्र से आए आइटी प्रोफेशनल शिशिर गायकवाड़ मेरे प्रश्न के उत्तर में कुछ यूं मुदित दिखे। सुझाव देते हैं-आप भी पेन, नोटबुक बैग में रखें और घंटे दो घंटे केवल पैदल भ्रमण करें। हर छोर पर समाचार कथाएं मिलेंगी। हंसते हुए निकल गए।
यह घने कुंहासे वाली निशा थी ,जो पौष पूर्णिमा से भेंटकर मकर संक्राति की भोर की राह निहार रही थी। हम तीर्थराज प्रयागराज शहर के बसअड्डे पर थे। अलाव धधक रहा था। अरे, यह क्या...कहीं इनके पांव आग में न पड़ जाएं।
पैदल यात्रा की थकान में चूर एक युवक आंच से ऐसा मदहोश हुआ कि अलाव किनारे खुली भुईं पर पसर गया। मेरी चिंता भांप बगल बैठे राहगीर ने उसके पांव अलाव से दूर कर दिए। आप साथ हो इनके..? ना जी। मैं ना जानूं कि कौण है यो? मतलब केवल मानवता का रिश्ता था जो बेसुध युवक की चिंता में था। यही है मन का मेला।
मेला नियंत्रण कक्ष आ जाएं...
दारागंज होते हुए नागवासुकी मंदिर को जोड़ने वाले मार्ग से मेला क्षेत्र...। ध्वनिविस्तारक यंत्र से वही पारंपरिक उद्घोषणा... देवरिया भाटपार रानी की मालती देवी.... मालती देवी आवाज सुन पा रहीं हों तो मेला नियंत्रण कक्ष आ जाएं। आपके पति लालजी कनौजिया वहां आपका इंतजार कर रहे हैं। यह सुन साथ चल रहे जत्थे में एक युुवक बोल पड़ा.. अब यह समझना चाहिए कि मालती देवी मेला नियंत्रण कक्ष कैसे खोज सकेंगी?
गंगा घाट पर बने हैं पीपे के 31 पुल। प्रवेश के लिए अलग, निकासी के लिए अलग। सम संख्या वाले पीपे पुल से प्रवेश और विषम संख्या वाले पुल से निकासी। यह है प्रशासनिक व्यवस्था। अब दिखाते हैं व्यक्तिगत व्यवस्था। संगम की रेती पर एक युवा एक बुजुर्ग का क्षौर कर्म (सिर मूंड़ना) कर रहे।
कुछ देर बाद यह क्रम उल्टा हुआ। बुजुर्ग ने रेजर संभाला और युवक के सिर के बाल उतार दिए। पूछा तो पता चला पिता-पुत्र हैं। स्वयंसेवा? नाई हैं तो घाट पर? कहते हैं हाईजीन इश्यू। मतलब स्वच्छता का मामला है।
मेले के दृश्य अनूठे हैं। मेले की कहानियां अनगिनत हैं। कोई 30 साल पुराने मित्र के साथ चौथी बार कुंभ स्नान का सौभाग्य प्राप्त कर रहा तो कोई इस बात की खुशी से फूला न समा रहा कि घुटने के दुसह दुख के बाद मां को संगम में डुबकी लगवा ही दी।
टेंट सिटी पांच फरवरी तक फुल
टेंट सिटी पांच फरवरी तक फुल है। आप चिंता न करें। रैनबसेरे हैं। बिल्कुल मुफ्त। बस, आप में फक्कड़ी, थोड़ी सधुक्कड़ी और घुमक्कड़ी के गुण हों, पैदल चलने का आनंद रस लेते हों तो आएं। भोजन के लिए भंडारे हैं। स्वास्थ्य और सुरक्षा की चिंता मेला प्रशासन कर ही रहा। कुछ आप आत्मअनुशासित हो जाएं। इतने बड़े मेले में कुछ उन्नीस बीस तो होगा ही। तो आइए घूम जाइए। आलस तज दीजिए। तीर्थराज की गुलाबी ठंड आपकी प्रतीक्षा मेें हैं।
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