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    सजा के बाद नियमानुसार म्यांमार भेजने का आदेश निर्वासन का निर्देश नहीं: हाई कोर्ट

    Updated: Fri, 02 Jan 2026 01:29 AM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सत्र अदालत का म्यांमार नागरिक रशीदा बेगम को सजा पूरी होने के बाद 'नियमानुसार' देश भेजने का सुझाव निर्वासन का स ...और पढ़ें

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    विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सत्र अदालत ने बर्मा (म्यांमार) के नागरिक याची के निर्वासन का आदेश नहीं दिया है केवल सुझाव दिया है कि बरी होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई करें। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने महाराजगंज में पकड़ी गई रशीदा बेगम की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, महाराजगंज की अदालत द्वारा 22 मई, 2024 को दिए गए आदेश के खिलाफ यह याचिका दायर की गई थी।

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    ट्रायल कोर्ट ने फारेनर्स एक्ट, 1946 की धारा 14-ए के तहत अपराध के लिए दोषी पाते हुए दो साल की कैद के साथ 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। कहा था कि जुर्माना न देने पर दो महीने की अतिरिक्त कैद की सजा काटनी होगी। यह भी कहा था कि सजा पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार रशीदा को उसके देश बर्मा (म्यांमार) भेज दिया जाएगा। याची के वकील का कहना था कि ट्रायल कोर्ट को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है।

    याचिका में केवल सेशन कोर्ट के आदेश के पैराग्राफ 34 को है चुनौती 

    कहा गया कि याचिका में केवल सेशन कोर्ट के आदेश के पैराग्राफ 34 को चुनौती है, जिसमें अपीलार्थी को म्यांमार वापस भेजने का निर्देश है। सेशन कोर्ट को ऐसा निर्देश देने का अधिकार नहीं है, खासकर जब आवेदनकर्ता के पास वैध पहचान दस्तावेज हैं जो उसे भारतीय नागरिक साबित करते हैं। पीठ ने कहा ‘नियमानुसार’ तथा ‘नियमों के अनुसार कार्रवाई करें’ जैसे शब्दों का यह अर्थ नहीं है कि अदालत ने निर्वासन का आदेश दिया है।

    इससे पहले कानून के अनुसार प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसमें संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना और उनके अधिकारों का संरक्षण शामिल है। अदालत की भूमिका केवल इतना सुनिश्चित करना रहता है कि कानून के अनुसार प्रक्रिया पूरी की गई है, न कि निर्वासन का आदेश देना। निर्वासन का निर्णय संबंधित अधिकारियों को लेना होता है। सरकार की तरफ से कहा गया कि सेशन कोर्ट के आदेश में कोई गलती नहीं है, क्योंकि यह निर्देश नहीं है, बल्कि सुझाव है।

    उच्च न्यायालय ने कहा, सेशन कोर्ट के आदेश में कोई गलती नहीं है। सेशन कोर्ट का आदेश यह नहीं कहता है कि याची को निश्चित रूप से उसके देश वापस भेजा जाए, बल्कि यह कहता है कि आवश्यक कार्रवाई की जाए। इसलिए पुनरीक्षण याचिका खारिज की जाती है।