आज भी गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते की याद संजोए है दनकौर का श्री गुरु द्रोणाचार्य का मंदिर
गौतमबुद्ध नगर के दनकौर कस्बे में श्री गुरु द्रोणाचार्य का प्राचीन मंदिर है। सैंकड़ों वर्ष पहले बना यह मंदिर भारत में विख्यात है।
दनकौर, मुस्तकीम खान। पौराणिक कथाओं में एकलव्य की गुरु भक्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। जहां कहीं गुरु और शिष्य का जिक्र होता है, वहां एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य का नाम आना स्वाभाविक है। गौतमबुद्ध नगर के दनकौर कस्बे में श्री गुरु द्रोणाचार्य का प्राचीन मंदिर है। सैंकड़ों वर्ष पहले बना यह मंदिर भारत में विख्यात है। देश के विभिन्न राज्यों से लोग यहां दर्शन करने आते हैं।
प्राचीन काल में एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य की शरण में गए थे। बताया जाता है कि क्षत्रिय कुल से न होने के कारण गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हें धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। एकलव्य अंतर्मन से उन्हें अपना गुरु मान चुके थे और उन्हीं से धनुर्विद्या सीखने की प्रतिज्ञा भी ली थी। अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने एवं धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त करने के लिए एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर उसके सामने अभ्यास करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप एकलव्य धनुर्विद्या में इतने निपुण हो गए कि महान धनुर्धर भी उनके सामने नही टिक पाते थे। उनकी ख्याति विश्व में फैलने लगी तो किसी कारण से गुरु द्रोणाचार्य भी उसी स्थान पर पहुंचे, जहां एकलव्य अभ्यास करते थे। वहां अपनी प्रतिमा को देखकर चकित रह गए और एकलव्य की गुरु भक्ति से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा भी की। उन्हें अपना शिष्य भी मान लिया था। बाद में द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में उनका दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया था।
इसके अलावा मंदिर प्रांगण में एकलव्य का सुंदर पार्क है। पार्क के बीच एकलव्य की सुंदर प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर में एक तालाब है। इस तालाब को 1883 में कैप्टन सर जेम्स साल्ट पीटर नाम के एक अंग्रेज ने पक्का कराया था। आज इस तालाब में पानी नहीं है। इस तालाब में प्रत्येक वर्ष मेले के अवसर पर विशाल दंगल का आयोजन किया जाता है जो उत्तर प्रदेश का सर्वोच्च दंगल माना जाता है।
इस तालाब की यह खास बात है कि चाहे इसमें जितना भी पानी भर जाए, आठ घंटे से अधिक समय तक पानी नही रह पाता है। चाहे बरसात का मौसम हो या अन्य कोई कारण हो, करीब बीस फीट गहरे इस तालाब में पानी गायब हो जाता है। तालाब के पास एक विशाल रंगमंच है जिसमें मेले के अवसर पर द्रोण नाट्य मंडल द्वारा पारसी स्टाइल में पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व सामाजिक नाट्य प्ररस्तुत किए जाते हैं। इस रंगमंच की स्थापना 1923 में हुई थी और 1964 के आसपास यह पक्की स्टेज बनाई गई थी। पारसी अंदाज और सांस्कृतिक कार्यक्रम की नींव दनकौर में पंडित मंगतराम मास्टरजी ने रखी थी। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर प्रत्येक वर्ष यहां मेले का आयोजन होता है।
यह मेला करीब दस दिनतक चलता है। मेले में विशाल दंगल का आयोजन भी होता है। तीन दिन तक चलने वाले इस दंगल में दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश से पहलवान भाग लेते हैं। इस दौरान विभिन्न प्रकार के नाटक, रागनी, कव्वाली, कवि सम्मेलन व रंगारंग, चित्रहार आदि का आयोजन किया जाता है। मेला देखने के लिए जनसैलाब उमड़ जाता है। वर्तमान वर्ष में कोरोना महामारी के चलते मेले का आयोजन नही हो सका।
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