1857 Kranti In India: मेरठ की वो शाम, आग की लपटें, धांय-धांय और धड़ाम होते गए अंग्रेज, थिएटर में भर दिए थे शव
Meerut 1857 Kranti in India मेरठ में 10 मई 1857 को हुई क्रांति से ही स्वतंत्र भारत की सुबह आई। क्रांतिकारियों की रणनीति ने अंग्रेजों को मारा नुकसान पहुंचाया। सेंट जोंस सिमेट्री के रिकार्ड में 32 शवों के दफनाने की जानकारी है।

मेरठ, जागरण संवाददाता। 10 मई 1857 की शाम छावनी चर्च में प्रार्थना की तैयारी चल रही थी। तभी एकाएक माहौल भारी हो गया और क्रांति की शुरुआत हो गई। पहले भीषण लपटें सुलगने लगी। कैंट परेड ग्राउंड की ओर से धुआं और धमाकों का शोर उठने लगा।
धमाके सुनकर नौकरों ने घर के दरवाजे बंद कर दिए। कुछ ही मिनटों में अंधेरा गहरा गया, जिसे कहीं-कहीं सरकारी संपत्ति जलने से रोशनी हो रही थी। इसी दौरान चारों ओर से गोलियों का शोर उठने लगा। जिंदगी बचने की कोई उम्मीद न थी। ऐसे में कमिश्नर का परिवार सरकारी आवास की छत पर शरण में चला गया।
गार्डों को धक्का देकर अंदर आए भारतीय
कमिश्नर असलाह लोड करने में लग गया। कुछ देर के बाद निचली मंजिल में पहरा दे रहे गार्डों को धकियाते हुए कुछ भारतीय घर में घुस आए। किसी तरह से सब लोग भागकर निकले। उधर, उन लोगों ने घर में तोड़फोड़ की, फिर आग लगा कर चले गए। सुबह हुई तब तक कमिश्नर हाउस राख का ढेर बन चुका था।
हर तरफ अंग्रेजों की लाशें थिएटर में भी भर दिए शव
10 मई को क्रांति के दिन बड़ी संख्या में अंग्रेज मारे गए। माल रोड पर स्थित थिएटर, जो अब कमांडेंट वर्क्स इंजीनियर्स आफिस के नाम से जाना जाता है और वहां पर रक्षा संपदा कार्यालय चलता है, उस में 50 से अधिक शव भर दिए गए। वैसे सेंट जोंस सिमेट्री के रिकार्ड में 32 शवों के दफनाने की जानकारी है। शेष लोगों का कोई रिकार्ड नहीं है। अंग्रेजों की सबसे अधिक हत्याएं सदर बाजार और पुरानी जेल (अब केसरगंज मंडी) के पास की गई थी।
85 सैनिकों का कोर्ट मार्शल
थर्ड लाइट कैवेलरी के अंग्रेज कमांडर कर्नल कारमाइकल स्मिथ के आदेश पर छह मई 1857 को 85 सैनिकों का कोर्ट मार्शल हुआ। आरोप लगाया कि 24 अप्रैल 1857 को चर्बी लगे कारतूस प्रयोग करने का आदेश इन सैनिकों ने नहीं माना। सैनिकों को नौ मई को विक्टोरिया पार्क जेल में डाल दिया गया। सैनिक जेल तोड़ने की तैयारी में जुट गए थे। वहीं क्रांतिकारी भी इन सैनिकों को जेल से छुड़ाने की योजना में लग गए।
दिनभर विक्टोरिया पार्क पर वेश बदल कर क्रांतिकारी जुटने लगे। 10 मई की शाम जैसे ही क्रांति की ज्वाला भड़की क्रांतिकारियों के साथ ही थर्ड कैवेलरी के भारतीय सैनिक अश्वों पर सवार होकर सशस्त्र पहुंचे और जेल पर हमला बोलकर अपने साथियों को आजाद कराकर ले गए। केसरगंज जेल को भी तोड़कर साथियों को मुक्त करा ले गए।
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