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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 10, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Today History: 1857 की क्रांति से अछूता नहीं रहा आगरा, पढ़ें अनसुने किस्से; जिन्हें आज भी नहीं जानते लोग

By Narender SanwariyaEdited By: Narender Sanwariya
Published: Wed, 10 May 2023 06:00 AM (IST)

शहर में अंग्रेजी राज समाप्त होने और बादशाह बहादुर शाह जफर का शासन शुरू होने की मुनादी की गई थी। ...और पढ़ें

Today History: 1857 की क्रांति से अछूता नहीं रहा आगरा, पढ़ें अनसुने किस्से; जिन्हें आज भी नहीं जानते लोग
Today History: 1857 की क्रांति से अछूता नहीं रहा आगरा, पढ़ें अनसुने किस्से; जिन्हें आज भी नहीं जानते लोग

आगरा, जागरण संवाददाता। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में अत्याचारी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीयों के मन में दबी चिंगारी फूट पड़ी थी। मेरठ में 10 मई, 1857 को भारतीय सैनिकों के विद्रोह के साथ शुरू हुए पराधीनता की बेड़ियों से स्वयं को मुक्त कराने के आंदोलन में आगरा भी अछूता नहीं रहा था। आगरा की पुलिस ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।

शहर में अंग्रेजी राज समाप्त होने और बादशाह बहादुर शाह जफर का शासन शुरू होने की मुनादी की गई थी। आगरा में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रचार मौलवी अहमद शाह और शहजादा फिरोज शाह ने किया था। यहां 21 मई तक शांति रही थी।

पुस्तक "आगरा के स्वतंत्रता सेनानियों की अमर गाथा' में उल्लेख है कि 21 मई को दिल्ली सल्तनत के शहजादे का आगरा आगमन हुआ। इसी दिन पैदल सेना के अस्पताल में आग लग गई। 28 मई को नसीराबाद और तीन जून को नीमच की विद्रोही सेना यहां आ गई थी। घबराए अंग्रेजों ने आगरा किला में शरण ली थी।

"आगरानामा' में सतीशचंद्र चतुर्वेदी लिखते हैं कि दो जुलाई, 1857 को क्रांतिकारी सैनिक फतेहपुर सीकरी पहुंच गए। शाहगंज में तैनात कोटा के सैनिकों को उनसे मुकाबले के लिए अंग्र्रेजों ने भेजा। चार जुलाई को इन सैनिकों ने क्रांतिकारियों को दबाने के बजाय अंग्रेज सेनानायक को ही गोली से उड़ा दिया।

अंग्रेजों की सहायता को आए करौली रियासत के सेनानायक सैफुल्ला खां ने अपने सैनिकों को वापस भेज दिया। धौलपुर के देवहंस गूजर ने खेरागढ़ तहसील व जाजऊ में आक्रमण कर अंग्रेजी राज समाप्त कर दिया। छह जुलाई को आगरा की सभी तहसील व थाने क्रांतिकारियों ने अपने नियंत्रण में ले लिए।

इसी दिन आगरा पुलिस ने विद्रोह कर दिया। शहर में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस अधिकारी मुराद अली ने शहर की गलियों में ढोल पीटकर अंग्रेजी राज समाप्त होने और बादशाह का शासन प्रारंभ होने की मुनादी की।

किले में हुआ काल्विन का निधन

इतिहासविद् राजकिशोर राजे बताते हैं कि वर्ष 1857 में आगरा में लेफ्टिनेंट गर्वनर जान रसेल काल्विन तैनात था। स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों के साथ उसे आगरा किला में शरण लेनी पड़ी। लेफ्टिनेंट गर्वनर जान रसेल काल्विन परेशान होकर बीमार पड़ गया। नौ सितंबर, 1857 को किले में ही उसका निधन हो गया। उसकी कब्र आज भी आगरा किला में दीवान-ए-आम के सामने बनी हुई है।