Hastinapur Excavation: महाभारत के साथ सिंधु की तरह महान सभ्यता के प्रमाण देगा हस्तिनापुर
Hastinapur Excavation 1950-52 के उत्खनन में जो गेरुआ रंग के बर्तन मिले थे वही इंद्रप्रस्थ और अहिच्छेत्र में भी मिले थे। जिले के आलमगीरपुर में मिले थे सिंधु सभ्यता के प्रमाण हस्तिनापुर किसी महान सभ्यता का दे रहा संकेत।

मेरठ, प्रदीप द्विवेदी। हस्तिनापुर की धरती के नीचे महाभारत काल के प्रमाण के साथ-साथ किसी महान सभ्यता के प्रमाण भी मिल सकते हैं। वर्तमान में जो उत्खनन से मिट्टी, काली मिट्टी व बालू की परतें मिली हैं उससे किसी सभ्यता के बार-बार नष्ट होने और बसने के प्रमाण मिलने लगे हैं तो वहीं वर्षाें पहले उत्खनन से जो अवशेष मिले थे वह भी इसके महाभारत कालीन होने व सिंधु सभ्यता की तरह किसी अन्य महान सभ्यता के विकसित होने की ओर इशारा कर रहे हैं। हस्तिनापुर की माटी के नीचे सूंग, कुषाण, शाख सभ्यता के लोगों के बसावट के साक्ष्य वर्षों पहले मिल गए थे। हस्तिनापुर उत्खनन के दौरान ही लगभग 3200 वर्ष पुराने मिट्टी के गेरुआ रंग के पात्र में चावल के प्रमाण मिले थे। मिट्टी के इस विशेष बर्तन में जले हुए चावल का टुकड़ा मिला था। यह भारत में चावल मिलने का अब तक का सबसे पुराना प्रमाण था। 3200 वर्ष पुरानी सभ्यता ही महाभारतकालीन मानी जाती है। जिले के ही आलमगीर पुर में सिंधु सभ्यता के प्रमाण पहले ही मिल चुके हैं। सिनौली के उत्खनन में भी वही धूसर मृदभांड मिले थे जो हस्तिनापुर के उत्खनने में मिले थे। मोदी डिग्री कालेज, मोदीनगर के इतिहास विभाग के प्रोफेसर और इतिहासकार डा. केके शर्मा का कहना है कि 1950-52 में जब उत्खनन हुआ था तब ऐसे प्रमाण मिले थे हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे। इससे हो सकता है कि जो अब कुछ प्रमाण मिलें वह उसी के समान किसी नई सभ्यता को उजागर करें। ओकर कलर्ड पाटरी यानी गेरुआ रंग के बर्तन यहां खोदाई में मिले थे। यही बर्तन इंद्रप्रस्थ और अहिच्छेत्र में भी मिले थे। ये सभी स्थल महाभारत काल के हैं। इसलिए माना गया कि महाभारत काल में इसी तरह के बर्तन का प्रचलन रहा होगा। इसलिए उनसे संबंधित स्थलों में मिल रहे हैं। यही नहीं सिनौली में भी इसी तरह के बर्तन मिले थे। आइए जानते हैं हस्तिनापुर के बारे में जो 1950-52 के उत्खनन में मिले अवशेषों के माध्यम से- भारतीय पुरातत्व के पितामह माने जाने वाले डा. बीबी लाल की अगुवाई में 1950-52 में हस्तिनापुर में जो खुदाई हुई उसमें एक-दो नहीं कई सभ्यताओं के निशान मिले थे।
3200 वर्ष पुरानी सभ्यता :
हस्तिनापुर की खोदाई में जो सबसे पुरानी सभ्यता मिली, वह लगभग 3200 वर्ष पुरानी थी। इसमें ओकर कलर्ड पाटरी यानी मिट्टी के गेरुआ रंग के बर्तन मिले, साथ ही कापर होर्ड के भी सामान थे। सिनौली उत्खनन में भी इस तरह की सभ्यता मिली है।
3100-2800 वर्ष पुरानी सभ्यता :
इसी खोदाई में चित्रित धूसर मृदभांड यानि पेंटेड ग्रे वेयर मिला। कार्बन डेटिंग में यह लगभग 3100 से 2800 वर्ष पुरानी आंकी गई। यह एक बेहद उन्नत किस्म की पाटरी थी। मिट्टी से बने इन पाटरी की खनक चीनी मिट्टी के सामानों की सी है। एएसआइ की टीम ने बूढ़ी गंगा के नीचे जब बोरवेल लगाया था तो रेत के साथ इस पाटरी के टुकड़े भी साथ आए थे। इससे यह माना गया कि गंगा ने अपने अंदर इस सभ्यता को समेट लिया था। बाद में इतिहासकारों ने चित्रित धूसर मृदभांड की सभ्यता को महाभारत के समकालीन बताया था।
2600-2300 वर्ष पुरानी सभ्यता :
यह बौद्ध और महावीर का समय माना जाता है। मौर्य काल के इस समय के लोहे के कई उपकरण भी खोदाई में प्राप्त हुए थे। 2100-1800 वर्ष पुरानी सभ्यता: इस कालखंड में सूंग, कुषाण, शाख सभ्यता के लोगों की मौजूदगी इसी कालखंड की मानी जाती है। हस्तिनापुर की माटी के नीचे से बीबी लाल और उनकी टीम को इस सभ्यता के लोगों की बसावट के साक्ष्य मिले थे।
1400-1200 वर्ष पुरानी सभ्यता :
यह कालखंड सल्तनत काल का है। इस समय के मंदिरों के अवशेष मिले थे। हालांकि जो प्रमाण मिले, उससे ऐसा लगता है कि तब तक हस्तिनापुर अपना मूल स्वरूप खो चुका था, और यहां छोटा-मोटा रिहायशी इलाका ही रहा होगा। चावल के सबसे पुराने प्रमाण भी यहीं के थे।
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