वृंदावन, जासं। मुगलकाल में जब पूरे देश में ¨हदू साम्राज्य सिमट रहा था। ऐसे में छत्रपति महाराज शिवाजी ने सन 1674 ई. में अपने राज्य रोहण पर रायगढ़ किले की टकसाल से जारी किया। शिवाजी ने सोने व तांबा धातुओं के अपने स्वतंत्र सिक्के जारी किए थे। शिवाजी की स्वर्णमुद्रा को 'होन' कहा जाता था और ताम्र मुद्रा को 'शिवराई'। इसके अगले भाग में 'छत्रपति' अभिलेख अंकित है और पीछे 'श्रीराजा शिव' अभिलेख अंकित है। शिवाजी द्वारा अपने साम्राज्य में जारी की गईं मुद्राएं आज भी ब्रज संस्कृति शोध संस्थान में संरक्षित हैं। यह शिवाजी की वीर गाथा की कहानी कह रही हैं।

मंदिर गोदाबिहार स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान में संरक्षित इन मुद्राओं के बारे में सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी ने बताया कि संस्थान में संग्रहीत यह तांबे का वह दुर्लभ सिक्का है। इसे छत्रपति महाराज शिवाजी ने सन 1674 ई. में अपने राज्य रोहण पर रायगढ़ किले की टकसाल से जारी किया था। शिवाजी ने सोने व तांबा धातुओं के अपने स्वतंत्र सिक्के जारी किए थे। शिवाजी ने इस स्वर्ण मुद्रा को 'होन' का नाम दिया। जबकि ताम्र मुद्रा को 'शिवराई' कहा जाता था। शिवाजी की शिवराई ताम्र मुद्रा के अगले भाग में में 'छत्रपति' अभिलेख अंकित है और पिछले भाग में श्रीराजा शिव अंकित है। तिवारी ने कहा पूरे मुगलकाल में शिवाजी ही ऐसे एक मात्र शासक थे। जिन्होंने अपने नाम के स्वतंत्र सिक्के जारी किए थे। इन सिक्कों की एक विशेषता यह भी है कि इन पर ¨हदी व नागरी लिपि में मुद्रा अभिलेख अंकित किए गए हैं। ऐसा प्रयोग पूरे मुगलकाल में अकेले शिवाजी ने ही किया। शिवाजी की स्वराज्य अवधारणा का यह सिक्का जीवंत प्रमाण है। शिवाजी 17 वीं शताब्दी के सब से बड़े वास्तविक नायक थे। शिवाजी का व्यक्तित्व आज भी हमें प्रेरणा दे रहा है।

जारी होगी विवरणिका

मुद्राविद् परमानन्द गुप्त ने बताया कि छत्रपति शिवाजी महाराज के जन्मदिन पर इस सिक्के के दुर्लभ ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रख कर संस्थान ने एक शोध पूर्ण जानकारी से युक्त सचित्र विवरणिका प्रकाशित की है। जो शोधार्थियों और आम लोगों के लिए मूल्यवान साबित होगी।

Posted By: Jagran

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