UPPCL: क्या यूपी में सस्ती होने वाली है बिजली यूनिट? चार वर्ष से तो यथावत हैं दरें
उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें महंगी होने के आसार नहीं हैं। दरअसल उपभोक्ताओं का बिजली कंपनियों पर 33122 करोड़ रुपये सरप्लस है। इसे देखते हुए माना जा रहा है कि विद्युत नियामक आयोग कानूनन बिजली की दरें बढ़ाने के संबंध में निर्णय नहीं करेगा। हालांकि पावर कारपोरेशन ने 11203 करोड़ रुपये के राजस्व गैप की भरपाई के लिए आयोग से बिजली की दरें बढ़ाने की मांग की है।
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। लगातार पांचवें वर्ष भी राज्य में बिजली की दरें यथावत रहने के आसार हैं। महंगाई की मार झेल रहे प्रदेशवासियों को और महंगी बिजली होने से राहत मिल सकती है। उपभोक्ताओं का बिजली कंपनियों पर 33,122 करोड़ रुपये सरप्लस निकलने के आधार पर माना जा रहा है कि विद्युत नियामक आयोग कानूनन बिजली की दरें बढ़ाने के संबंध में निर्णय नहीं करेगा।
सरप्लस को देखते हुए उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने तो आयोग से बिजली की दरें घटाने की मांग की है। हालांकि, वित्तीय संकट से जूझ रहे पावर कारपोरेशन ने 11,203 करोड़ रुपये के राजस्व गैप की भरपाई के लिए आयोग से बिजली की दरें बढ़ाने की मांग की है।
वर्ष 2024-25 के लिए बिजली की दरों के प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के संबंध में विद्युत नियामक आयोग ने सोमवार को राज्य सलाहकार समिति की बैठक बुलाई थी। आयोग के अध्यक्ष अरविन्द कुमार की अध्यक्षता में लगभग दो घंटे चली बैठक में बिजली की दरों के संबंध में बिजली कंपनियों से लेकर उपभोक्ता प्रतिनिधियों ने दो घंटे तक चर्चा की।
वैसे तो पावर कारपोरेशन प्रबंधन द्वारा आयोग में दाखिल किए गए एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक राजस्व आवश्कता (एआरआर) के साथ बिजली की दरों के संबंध में कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया था लेकिन मौजूदा दरों से 11,203 करोड़ रुपये के राजस्व गैप को देखते हुए बैठक में कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक पंकज कुमार ने कहा कि गैप की प्रतिपूर्ति के लिए आयोग खुद दरों को बढ़ा दे।
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने राजस्व गैप के आंकड़े खारिज करते हुए कहा कि जब उपभोक्ताओं का ही बिजली कंपनियों पर 33,122 करोड़ रुपये सरप्लस निकल रहा है तब फिर कानूनन बिजली की दरें नहीं बढ़ाई जा सकती हैं। पावर कारपोरेशन की ओर से सरप्लस पर आयोग से पुनर्विचार की बात करने पर परिषद अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि आयोग टाइपिंग की गड़बड़ी को छोड़ अपने किसी भी आदेश का रिव्यू नहीं कर सकता।
वर्ष 2017-18 में उपभोक्ताओं का 13,337 करोड़ रुपये सरप्लस
वर्मा ने कहा कि वर्ष 2017-18 में उपभोक्ताओं का 13,337 करोड़ रुपये सरप्लस था। बाद के वर्षों में भी सरप्लस निकलने से अब यह 33,122 करोड़ रुपये हो गया है। टैरिफ पालिसी के तहत तो तीन वर्ष में ही सरप्लस का समायोजन हो जाना चाहिए था। वर्मा ने प्रस्ताव सौंपते हुए कहा, आयोग, बिजली कंपनियों की खराब वित्तीय स्थिति को देखते हुए अगर एक साथ 40 प्रतिशत बिजली की दरें न घटाए तो पांच वर्ष तक आठ प्रतिशत बिजली की दरों में कमी करने का आदेश पारित करे ताकि उपभोक्ताओं का हिसाब बराबर हो सके।
एनपीसीएल पर उपभोक्ताओं के निकले 1081 करोड़ रुपये सरप्लस के एवज में नोएडा पावर कंपनी की भी बिजली दरों में अगले दो वर्षों तक 10 प्रतिशत की छूट और बनाए रखी जाए। कंपनी क्षेत्र के किसानों को भी मुफ्त बिजली का लाभ दिया जाए। यूपी मेट्रो के प्रबंध निदेशक सुशील कुमार ने बैठक में मेट्रो की बिजली दरें कम करने का तो डाक्टर भारत राज सिंह ने सोलर की दरों के संबंध में अपनी बात रखी।
बैठक में सभी का पक्ष सुनने के बाद आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि जल्द ही बिजली की दरों को अंतिम रूप देते हुए आदेश किया जाएगा। माना जा रहा कि अगस्त के अंत या सितंबर में आयोग आदेश जारी कर देगा। जानकारों का कहना है कि अगर आयोग ने कारपोरेशन द्वारा दिखाए गए राजस्व गैप की भरपाई करने के लिए दरें बढ़ाने के संबंध में निर्णय किया तो मौजूदा बिजली की दरें 10 से 20 प्रतिशत बढ़ेंगी।
उल्लेखनीय है कि पिछले चार वर्ष से राज्य में बिजली की दरें यथावत बनी हुई हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद बिजली की दरों में औसतन 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी। तब गांव की बिजली लगभग 25 प्रतिशत तक महंगी हुई थी। बैठक में ऊर्जा विभाग के अपर मुख्य सचिव नरेंद्र भूषण सहित मध्यांचल डिस्काम के एमडी, नेडा के निदेशक, विभिन्न विभागों के सचिव/विशेष सचिव और उपभोक्ता संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
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