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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 30, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Polluted Water In Ganga : गंगा नदी में सीधे बह रहा है 61 प्रतिशत नालों का गंदा पानी, एनजीटी तथा हाईकोर्ट भी जता चुका है नाराजगी

By Dharmendra PandeyEdited By:
Published: Sat, 30 Jul 2022 09:31 PM (IST)

Polluted Water In River Ganga प्रदेश में गंगा नदी में छोटे-बड़े कुल 301 नाले मिलते हैं। इनमें से 86 नाले ...और पढ़ें

Polluted Water In River Ganga : गंगा नदी में छोटे-बड़े कुल 301 नाले मिलते हैं
Polluted Water In River Ganga : गंगा नदी में छोटे-बड़े कुल 301 नाले मिलते हैं

लखनऊ [शोभित श्रीवास्तव]। प्रदेश में अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी गंगा नदी को गंदे नालों से मुक्ति नहीं मिल पा रही है। जीवनदायिनी गंगा नदी में 61 प्रतिशत नालों का गंदा पानी सीधा बह रहा है। तमाम बंदिशों के बाद भी सिर्फ केवल 39 प्रतिशत नाले ही टैप हैं।

प्रदेश में जीवनदायिनी गंगा नदी में अभी भी प्रदूषण कम नहीं हो पा रहा है। प्रदेश में आज भी 61 प्रतिशत नालों का गंदा पानी सीधे गंगा में मिल रहा है। सच्चाई यह है कि गंगा में मिलने वाले केवल 39 प्रतिशत नाले ही टैप हैं। सरकारी कागजों में 27 प्रतिशत नालों का काम चल रहा है, जबकि 26 प्रतिशत नाले ऐसे हैं जिनकी डीपीआर ही अभी बनी नहीं बनी है। स्थिति इतनी खराब है कि हापुड़ व बदायूं को छोड़ दिया जाए तो बाकी प्रदेश के किसी भी जिले में गंगा का पानी नहाने लायक नहीं है।

प्रदेश में गंगा नदी में छोटे-बड़े कुल 301 नाले मिलते हैं। इनमें से 86 नाले तो बिजनौर से लेकर कानपुर के बीच मिलते हैं, जबकि 215 नाले कानपुर से आगे बलिया तक में मिलते हैं। इनमें से केवल 117 नाले ही ऐसे हैं जो टैप हैं। 184 नालों में आज भी बगैर ट्रीटमेंट के ही सीवेज व गंदगी गंगा नदी में बहाई जा रही है। एनजीटी ने कई बार इस मामले में सरकार की फटकार भी लगाई है। इसके बावजूद अफसरशाही केवल आकड़ों की बाजीगरी पेश कर देती है।

एनजीटी तथा हाईकोर्ट ने लगाई थी फटकार

संबंधित विभागों की लापरवाही पर एनजीटी व हाईकोर्ट ने पिछले दिनों गंगा प्रदूषण को लेकर कड़ी नाराजगी जताई थी। हाईकोर्ट ने तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर गंभीर टिप्पणी भी की थी। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 301 नालों में से 82 नालों में अभी टैपिंग का काम चल रहा है। 77 तो ऐसे हैं जिनकी अभी डीपीआर तक नहीं बनी है। पहले चिह्नित 25 नाले ऐसे हैं जिनके बारे में अब अधिकारी कह रहे हैं कि इसमें एसटीपी बनाने की जरूरत नहीं है। यह हाल तब है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्राथमिकता में गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करना है।

तीन वर्ष बाद आचमन लायक हो सकेगी गंगा

प्रदेश में एक भी स्थान पर गंगा नदी का पानी आचमन लायक नहीं है। आचमन लायक गंगाजल को बनने में कम से कम तीन वर्ष का समय और लगेगा। प्रदेश में 77 नालों की अभी तक डीपीआर नहीं बनी है। डीपीआर बनने के बाद टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे। टेंडर स्वीकृत होने के बाद कम से कम दो वर्ष का समय सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने में लगेगा।

प्रदेश में गंगा जल की 32 स्थानों पर होती है जांच

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदेश में गंगा जल को जांचने के लिए 32 स्थानों से सैंपल लेता है। रिपोर्ट में 30 स्थानों पर गंगाजल बेहद प्रदूषित है। यही कारण है कि बोर्ड गंगा में प्रदूषण की रिपोर्ट वेबसाइट पर विलंब से अपलोड करता है, जबकि नियम यह है कि बोर्ड को तत्काल रिपोर्ट वेबसाइट पर जारी की जाए। इसके साथ ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, बोर्ड के अधिकारी ऐसा नहीं करते हैं।

रखी जा रही है प्रदूषण पर निगरानी

अपर मुख्य सचिव, पर्यावरण-वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, मनोज सिंह ने कहा कि हमारा काम प्रदूषण पर निगरानी रखना है। हम लगातार प्रदूषण पर निगरानी रख भी रहे हैं। जहां तक गंगा नदी की बात है प्रदेश में जैसे-जैसे एसटीपी बनते जा रहे हैं वैसे-वैसे उसका प्रदूषण भी कम होता जा रहा है। एसटीपी बनाने व इसे संचालित करने का काम जल निगम का है।

आने वाले समय में बेहतर हो जाएगी स्थिति

प्रबंध निदेशक उत्तर प्रदेश जल निगम (नगरीय), अनिल कुमार जो नाले अभी टैप नहीं हैं वहां बायो रेमिडिएशन (जैविक उपचार) के जरिए शोधन कार्य होता है। मानसून में बायो रेमिडिएशन का काम बंद हो जाता है। गंगा में मिलने वाले कई नालों में एसटीपी बनाने के लिए अभी तक डीपीआर तक न बनी होने की जो बात है तो जैसे-जैसे वित्तीय सहायता मिलती हम उसे बनवाते हैं। पहले से स्थिति में बहुत सुधार आया है, आने वाले कुछ वर्ष में स्थिति और बेहतर हो जाएगी।