लखनऊ [महेन्द्र पाण्डेय] कोई क्षण विशेष की घटना से कहानी तो बन जाती है पर, उपन्यास के लिए जीवनभर की जटिलताएं, राग-द्वेष की जरूरत होती है। यूं कहें तो उपन्यास संबंधों के भीतर का हिस्सा है, जो प्याज की तरह परत-दर-परत बंधा होता है। लेखक इन्हीं परतों में लिपटे संबंधों और समस्याओं को स्पर्श करते हुए शब्दों के मोती को उपन्यास रूपी माला में गूंथता है। शनिवार को अभिव्यक्ति के मंच पर जब साहित्य के उपन्यासकाल पर विद्वतजन ने चर्चा शुरू की तो सभी के जीवन का श्वेत-श्यामल स्वरूप प्रकट हो गया। विषय पर बात आगे बढ़ी तो उपन्यास की आधी हकीकत और आधा फसाना से सभी का साक्षात्कार हुआ। दरअसल, हकीकत और फसाना का आधा-आधा भाग लोगों के जीवन से जुड़ा था। 

साहित्यकार यतीन्द्र मिश्र ने संवाद की कला से मंचासीन साहित्यकार भगवानदास मोरवाल, हृषीकेश सुलभ और सत्यानंद निरुपम को विषय से जोड़ा तो जो भाव निकले उससे दर्शक बंध गए। करीब 45 मिनट तक वे मंच को निहारते बतरस का आनंद लेते रहे। यतीन्द्र मिश्र के सवाल पर वक्ताओं ने कल्पना और स्मृति का लेखा-जोखा रखा। सर्वप्रथम सत्यानंद निरुपम ने पहले और अब के उपन्यास पर रोशनी डाली-एक वक्त वह था जब चार-पांच सौ पेज का उपन्यास लिखा जाता था पर, अब जीवन की जटिलताओं को दो-ढाई सौ पेज में समाहित कर दिया जाता है। जो कहानी उपन्यास में लिखी जाती है, उसकी कीमत पाठकों की रुचि के अनुसार तय होती है न कि उसकी मोटाई या पेज से। सहज किस्सागोई से वास्ता न भी हो तो भी उपन्यास लोगों की पसंद बनते हैं और बिकते हैं। 

हृषीकेश सुलभ ने कहा कि असल में उपन्यास अनुशासन के साथ जीवन के रिश्तों में बंधा हुआ होता है। 1857 में जो था उसका 2019 से कैसे संबंध है, यही बताने का भाव उपन्यास है। भगवानदास मोरवाल भी इससे सहमत थे। वह दर्शकों को उपन्यासकाल के 20 वर्षों की यात्रा पर ले गए। लेखक की चुनौती और पाठकों के आशावाद का दर्शन कराते हुए स्मृतियों में उतार दिया। सफर के पड़ाव के बाद दर्शक यह समझ चुके थे कि उनके जीवन में भी उपन्यास है। उपन्यास पाठकों की रुचि पर निर्भर करता है। आज भले ही कोई उपन्यास लोगों को पसंद न आए पर, हो सकता है अगली पीढ़ी के पाठक को वही रुचिकर लगे। सत्यानंद निरुपम ने कहा कि उपन्यास को संपादित कर उसे पठनीय बनाया जा सकता है। कृष्ण बलदेव और निर्मला जैन का वाकया सुनाकर यह बताया कि किस तरह लेखकों ने प्रकाशक परिवर्तन का अधिकार दिया। पकी जेठ का गुलमोहर के रचनाकार से जब प्रश्न हुआ कि स्मृतिकथा की बजाय उपन्यास क्यों नहीं लिखा? भगवानदास ने अज्ञेय जी का एक दृष्टांत रखा। जिसमें उन्होंने कहा था, उपन्यास बंद करुंगा तो आत्मकथा लिखूंगा। इससे पहले दैनिक जागरण कार्यकारी संपादक विष्‍णु प्रकाश त्रिपाठी ने साहित्‍यकार हृषीकेश सुलभ की रचना अग्निलीक और भगवादास मोरवाल की कृति वंचना का विमोचन किया। 

रेखा, जया और वहीदा पर उपन्यास 

वक्ताओं से सवाल हुआ कि किसके चरित्र पर उपन्यास लिखना चाहेंगे? भगवानदास मोरवाल का जवाब था-रेखा। उन्होंने स्त्री की दृष्टि से अभिनेत्री के जीवन की जटिलता पर उपन्यास लेखन पर बल दिया तो हृषीकेश सुलभ ने जया बच्चन को उपन्यास का सबसे ताकतवर चरित्र करार दिया। सत्यानंद ने उपन्यास के लिए वहीदा रहमान को श्रेष्ठ पात्र चुना। 

पड़ाव के समीप हंसी का फव्वारा 

चौथा सत्र पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। यतीन्द्र मिश्र के सवाल पर तीनों वक्ताओं ने अपनी पसंद का श्रेष्ठ उपन्यास गिनाया। फिर प्रश्न हुआ, कौन ऐसा उपन्यास है जो पढऩे लायक नहीं है? मोरवाल ने कहा, मैं इसका जवाब नहीं दे सकता। हृषीकेश ने दांव मारा, मैं इसका जवाब दे देता अगर मोरवालजी यहां नहीं होते। फिर क्या.. तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच हंसी का फव्वारा छूट गया।  

दर्शक दीर्घा से सवाल 

राधेश्याम सोनी ने सवाल किया कि आत्मकथा छप जाने के बाद नाटक का मंचन करने पर लोगों को दिक्कत क्यों होती है? इसपर हृषीकेश ने कहा कि परिवार को धैर्यवान होना चाहिए। उन्हें अपने पूर्वजों को देवी-देवता नहीं मानना चाहिए। उसके रचने वाले को भी श्याम और धवल दोनों पक्ष को जानना चाहिए और स्पष्ट मंशा के अनुसार मंचन करना चाहिए। 

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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