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    UP News: बरेली के दवा व्यवसायी के फर्जी एनकाउंटर में आरोपी सभी पुलिसकर्मी बरी, एके 47 से चली थी गोलियां

    Updated: Mon, 28 Apr 2025 10:10 AM (IST)

    बरेली में दवा व्यवसायी मुकुल गुप्ता के कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में सभी छह आरोपी पुलिसकर्मियों को सीबीआई कोर्ट ने बरी कर दिया है। साक्ष्य के अभाव में विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण सीबीआई पांच ने यह फैसला सुनाया। इस हाई-प्रोफाइल केस में तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक (ट्रेनी आईपीएस) जे रवींद्र गौड़ सहित कई पुलिसकर्मी आरोपी थे। जानिए इस मामले से जुड़ी पूरी कहानी-

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    सीबीआई कोर्ट ने सभी छह आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है।

    विधि संवाददाता, लखनऊ। बरेली में दवा व्यवसायी मुकुल गुप्ता के कथित तौर पर फर्जी एनकाउंटर में हुई हत्या और लूटपाट के मुकदमे में विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण, सीबीआई पांच ने सभी छह आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। 

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    इस मामले में आरोपी बनाये गए बरेली के तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक (ट्रेनी आईपीएस) जे रवींद्र गौड़, सहित दो सिपाहियों के खिलाफ को साक्ष्य न मिलने के कारण सीबीआई ने उनके खिलाफ चार्जशीट दायर नहीं की थी। 

    मामले में गौरी शंकर विश्वकर्मा (पुलिस कांस्टेबल) जगवीर सिंह (पुलिस कांस्टेबल), विकास सक्सेना (सब इंस्पेक्टर) मूला सिंह (सब इंस्पेक्टर), वीरेंद्र शर्मा (पुलिस कांस्टेबल), देवेंद्र कुमार शर्मा (सब इंस्पेक्टर) आरोपी बनाए गए थे।

    यह है पूरा मामला

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, वादी ब्रजेन्द्र कुमार गुप्ता ने बेटे मुकुल की हत्या की रिपोर्ट बरेली के फतेहगंज पश्चिम थाने में दर्ज कराई थी, जिसमे बताया गया कि उसका बेटा मुकुल गुप्ता दवा का व्यवसाय करता था। उसी के चलते उसके पास एक लाख रुपये हर समय रहते थे। 

    इसी दौरान बरेली में प्रशिक्षण ले रहे ट्रेनी आईपीएस ने अपने अधिकारियों को खुश करने और बहादुरी का प्रमाणपत्र लेने लिए ट्रेनिंग के दौरान एक गैंग को समाप्त करने की योजना बनाई। बरेली में तैनात एक दारोगा उक्त आईपीएस का बहुत विश्वासपात्र था। 

    बरेली पुलिस का मुखबिर विक्की शर्मा उर्फ धर्मपाल टाटा सूमो गाड़ी से अनाधिकृत सवारियां ढोता था। पुलिस उसकी गाड़ी का प्रयोग अक्सर गैरकानूनी दबिश देने में करती थी। 

    वहीं, विक्की का एक रिश्तेदार पंकज उर्फ करन रिक्शा चलाता था। मृतक के मोहल्ले में ही रहता था। मृतक अक्सर उसी के रिक्शा से चलता था। उन लोगों की नजर मुकुल गुप्ता की व्यापारिक गतिविधियों पर रहती थी। 

    वादी ने आगे बताया कि उसे लोगों से पता चला कि तीस जून 2007 की सुबह उसका पुत्र पंकज उर्फ करन के रिक्शे में बैठकर अपने काम से जा रहा था। थोड़ी दूर जाने के बाद कोतवाली के दारोगा ने पंकज व अन्य से मिलीभगत कर रिक्शा रोक लिया तथा मुकुल का मोबाइल व एक लाख रूपये लूट लिया। 

    इसके बाद आरोपियों ने मुकुल गुप्ता को आईपीएस के हवाले कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अपने अन्य पुलिस वालों के साथ मिलकर वादी के पुत्र को फतेहगंज थाना क्षेत्र स्थित रुकुमपुर, मादवपीड़ रेलवे स्टेशन के पास टाटा सुमो में बैठा दिखाया।

    इसके बाद एके 47 से अंधाधुंध गोलियां चला कर सरेआम उसकी हत्या कर दी, जिसके बाद उन्होंने आपस में मिलकर उस हत्याकांड को फर्जी मुठभेड़ दिखा कर तथा अपने बचाव में मुकुल के ऊपर हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज किया था। 

    मामला दर्ज होने के बाद वादी ने इस मामले की विवेचना सीबीआई से कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मामले की विवेचना सीबीआई को सौंपी थी। सीबीआई ने 17 जून 2010 को मामला दर्ज कर विवेचना की थी। 

    बचाव पक्ष के अधिवक्ता विशाल टहलयानी ने बताया कि इस मामले की जांच कर सीबीआई ने 20 अगस्त 2014 को न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया। मुकदमे के दौरान आरोपी एक दारोगा और दो कांस्टेबल की मृत्यु हो गई। अभियोजन पक्ष ने इस मामले में 36 साक्षी न्यायालय में पेश किए।

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