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रिटायरमेंट के बाद पेश की मिसाल, मशरूम की खेती से बदली किस्मत, जानिए नीरज पांडेय की सफलता की कहानी

Published: Sat, 31 Oct 2026 07:53 PM (IST)

पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने कानपुर के चौबेपुर में मशरूम की खेती को आय का नया जरिया बनाया है। ...और पढ़ें

मशरूम दिखाते नीरज पांडेय। जागरण

मशरूम दिखाते नीरज पांडेय। जागरण 

HighLights

  1. सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने कानपुर में मशरूम की खेती शुरू की।

  2. चार वर्षों में उत्पादन बढ़ाकर 30 टन का लक्ष्य रखा।

  3. किसानों को कंपोस्ट व मशरूम खेती की तकनीक सिखाते हैं।

जागरण संवाददाता, कानपुर। चौबेपुर ब्लाक के मरियानी गांव निवासी पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्त नीरज पांडेय ने सेवानिवृत्त होने के बाद मशरूम की खेती को आय का नया जरिया बनाया है। चार वर्षों में वह आठ हटों तक उत्पादन बढ़ा चुके हैं और अब दो नए हट तैयार कर कुल 10 हटों से करीब 30 टन मशरूम उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उनका कहना है कि मशरूम की खेती में सफलता केवल उत्पादन नहीं, बल्कि सही समय पर बुआई, लागत नियंत्रण और बेहतर विपणन पर भी निर्भर करती है।

नीरज बताते हैं कि बटन मशरूम की खेती के लिए सितंबर से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पहले झोपड़ी तैयार की जाती है, फिर अक्टूबर में 30×60 फीट की एक झोपड़ी में 32 बेड बनाकर करीब 1200 किलो कंपोस्ट और लगभग 20 किलो स्पान (बीज) डाला जाता है। करीब सवा महीने बाद मशरूम निकलना शुरू हो जाता है और इसके बाद तुड़ाई व बिक्री का दौर चलता है।

Success Story Retired PWD Employee Builds a Successful Mushroom Business in Kanpur
मशरूम के लिए इस तरह से तैयार किया गया बेड। जागरण


एक झोपड़ी तैयार करने में करीब दो लाख रुपये की लागत आती है। इसमें ढांचा, कंपोस्ट, स्पान, मजदूरी और रखरखाव शामिल हैं। नीरज के अनुसार, एक उत्पादन चक्र में एक झोपड़ी से करीब तीन टन मशरूम प्राप्त हो सकता है। इसकी बिक्री से लगभग तीन लाख रुपये तक की आय होती है, जबकि सभी खर्च निकालने के बाद करीब 50 हजार रुपये तक बचत होने का अनुमान रहता है। हालांकि वास्तविक मुनाफा बाजार भाव और उत्पादन पर निर्भर करता है।

उत्पादित मशरूम की बिक्री शहर के गुम्टी क्षेत्रऔर साकेत नगर मंडियों के अलावा चौबेपुर क्षेत्र के फुटकर कारोबारियों को की जाती है। उनका कहना है कि मशरूम जल्दी खराब होने वाली फसल है, इसलिए उत्पादन शुरू करने से पहले बाजार तय करना जरूरी है।


वह कंपोस्ट भी तैयार कर किसानों को 12 से 14 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराते हैं और आसपास के किसानों को मशरूम उत्पादन की तकनीक, बेड तैयार करने, तापमान नियंत्रण और विपणन की जानकारी भी देते हैं। उन्होंने बताया कि छोटे स्तर से शुरुआत कर अनुभव और बाजार के आधार पर इस खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।

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