Updated: Sun, 15 Dec 2024 03:49 PM (IST)
नौटंकी एक पारंपरिक भारतीय लोक कला है जिसकी जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं। यह नाटक संगीत और नृत्य का एक अनूठा मिश्रण है जो आमतौर पर सर्दियों के मौसम में आ ...और पढ़ें
नौटंकी...जैसे ही मन-मस्तिष्क में ये शब्द आता है, तब रोचक व चुटीले, दोअर्थी संवाद, नक्कारा यानी नगाड़ा व साथ में नगड़िया की गूंज, ढोलक की थाप पर फिर थिरकते पांव। सर्दी का मौसम शुरू होते ही गांव-गांव नौटंकी के आयोजन पुराने लोगों को अब भी याद होंगे। धीरे-धीरे ये लोककला विलुप्त हो रही, लेकिन रामलीलाओं के मंचन में इसके संवाद अभी सुनाई पड़ते हैं।
कर्णप्रिय मधुर धुनें गूंजती हैं। नौटंकी यूं तो हीर-रांझा से लेकर लैला-मजनूं की कथावस्तु रहीं पर आधुनिक नौटंकी की शुरुआत ब्रज क्षेत्र से हुई। इसमें भगवान श्रीकृष्ण लीला का मंचन के साथ ही कलाकार नौटंकी करते थे। इसके बाद कन्नौज के रास्ते होते हुए नौटंकी कानपुर आई। यहां बिल्हौर क्षेत्र के मकनपुर में लगने वाले मेला में पहला मंचन हुआ। पढ़िए, शिवा अवस्थी की रिपोर्ट....
बुंदेलखंड-कानपुर व आसपास जिलों में लोककलाएं खूब पुष्पित व पल्लवित हुईं। बुंदेली धरा पर तो लोक कलाओं की लंबी-चौड़ी सूची व तमाम कलाकार अब भी हैं। ऐसे ही कानपुर परिक्षेत्र के ग्रामीणांचल में नौटंकी लोक कला के आयोजन गांव-गांव हुए।
घाटमपुर, बिल्हौर, नर्वल, जहानाबाद, सजेती से लेकर कानपुर देहात के मूसानगर, अकबरपुर, गजनेर के आसपास के कई गांवों में नौटंकी के कलाकार निकले। नौटंकी का कानपुर परिक्षेत्र में तेजी से विकास तब हुआ, जब आसपास क्षेत्रों से ये विधा यहां पहुंची।
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नौटंकी सर्दी के मौसम में रात गहराते ही शुरू होतीं और इनका मंचन भोर तक चलता। छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने अपने रंगमंच शीर्षक निबंध में नौटंकी पर चर्चा की है। उन्होंने लिखा है कि नौटंकी नाटक की ही अपभ्रंश है। हीर और रांझा को सबसे पहली नौटंकी का कथा वस्तु माना जाता है। आधुनिक नौटंकी की शुरुआत ब्रज क्षेत्र से हुई। रास मंडलियां कृष्ण लीला मंचन के साथ-साथ मध्य रात्रि के बाद पौराणिक व धार्मिक उपाख्यान पर मंचन करते थे, जिनमें नौटंकी भी शामिल थी।
ब्रज क्षेत्र में हाथरस के पंडित नत्था प्रसाद शर्मा ने नौटंकी कंपनी बनाई, जो दूर-दूर तक मंचन के लिए जाती थी। उनकी मंडली में सभी पात्रों का अभिनय पुरुष ही करते थे। स्त्रियों का मंचन में प्रवेश निषिद्ध हुआ करता था। इसके बाद नत्था प्रसाद की मंडली में कन्नौज के त्रिमोहन लाल, जो नगाड़ा अर्थात नक्कारा बजाते थे, उन्होंने इस लोक कला को आगे बढ़ाने का काम किया।
कानपुर इतिहास समिति के महासचिव अनूप कुमार शुक्ल बताते हैं, त्रिमोहन लाल ने कुछ वर्षों बाद अपनी नई नौटंकी कंपनी बना ली। कन्नौज के साथ ही उन्होंने बिल्हौर के मकनपुर मेले से नौटंकी का मंचन शुरू किया। उनकी नौटंकी कंपनी ने खूब ख्याति पाई। उत्तर भारत के क्षेत्रों में उन्हें बुलाया जाने लगा। त्रिमोहन लाल उस्ताद की नौटंकी कंपनी में पहली बार गुलाब बाई ने वर्ष 1929 में अभिनय की शुरुआत की थी। उस समय गुलाब बाई की उम्र केवल 11-12 साल के बीच थी। गुलाब बाई ने नौटंकी का मंचन पहली बार मकनपुर मेला में ही किया था।
त्रिमोहन लाल ने ही नौटंकी में सबसे पहले महिला कलाकारों को प्रवेश दिया था। उनमें से कृष्णा बाई व गुलाब बाई प्रमुख थीं। उनकी नौटंकी कंपनी को कन्नौज के प्रसिद्ध व्यापारी, उस समय के धनाढ्य व राजनेता चंद्र सेठ के संरक्षण में चलती थी। इसके बाद त्रिमोहन ने अपनी नौटंकी कंपनी का मुकाम कन्नौज से कानपुर बना लिया, जो औद्योगिक नगरी के रूप में शुरू से ही ख्यातिलब्ध रहा। देश भर के व्यापारी व उद्यमी यहां आते थे। इसलिए नौटंकी देखने वालों की संख्या भी बढ़ने लगी।
कनपुरिया शैली की नौटंकी के प्रवर्तक उस्ताद त्रिमोहन को नक्कारा बजाने में विशेष महारत हासिल थी। वे अपने प्रारंभिक दिनों मे हाथरस शैली की नौटंकी के प्रवर्तक पंडित नत्थाराम शर्मा की नौटंकी कंपनी में नगाड़ा बजाया करते थे। उस्ताद त्रिमोहन लाल नक्कारा बजाने के साथ अभिनय भी अच्छा करते थे। उनका कार्यक्षेत्र कानपुर से लेकर कन्नौज व आसपास के ग्रामीणांचल क्षेत्र में प्रमुख रूप से था। इन गांवों में उनकी नौटंकी के विशेष चर्चे रहते थे।
पुराने लोग बताते हैं कि एक बार त्रिमोहन लाल जब कानपुर स्थित फूलबाग में देशभक्ति पूर्ण नौटंकी का कथानक मंचन करा रहे थे तो अंग्रेज सरकार ने इसे कठोरतापूर्वक प्रतिबंधित कर दिया था। इसे लेकर काफी रस्साकशी भी हुई थी। फूलबाग में नौटंकी का मंचन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग भी पहुंचे थे।
आग की सेंक
नगड़िया की तेज ध्वनि नौटंकी में नगाड़े के साथ ही नगड़िया भी बजाई जाती है। वर्तमान में भी इसकी ध्वनि सुनाई पड़ती है। नगाड़े की ध्वनि मोटी, जबकि नगड़िया की बेहद तीव्र होती है। नगड़िया की ध्वनि में तीव्रता बनाए रखने के लिए उसे आग की सेंक लगाई जाती है। बजाने के लिए लकड़ी की चोपों का प्रयोग किया जाता था। नगाड़े के साथ ढोलक व हारमोनियम से संगत रहती थी। हारमोनियम ऊंचे स्टैंड पर रखी जाती थी। उसमें पैरों से हवा देकर दोनों हाथों से बजाया जाता था।
श्रीकृष्ण पहलवान और मंधना के जमींदार का योगदान
कन्नौज से त्रिमोहन लाल के आने से पहले भी कानपुर में नौटंकी लोक कला का मंचन हुआ करता था। उस समय मंधना के जमींदार लालमन दुबे लंबरदार को इसका श्रेय जाता है। इसी तरह कानपुर में कवि, शायर व लोक भाषाओं के मर्मज्ञ श्रीकृष्ण पहलवान भी नौटंकी के क्षेत्र से जुड़ा बड़ा नाम रहा। वे नौटंकी साहित्य के प्रणेता व प्रकाशक थे। उनकी प्रकाशन संस्था श्रीकृष्ण पुस्तकालय चौक कानपुर का नाम अब भी पुराने लोगों के जेहन में है। यहां से आल्हा के 52 खंडों की लड़ाइयां भी मिलती थीं।
श्रीकृष्ण पहलवान की नौटंकी कंपनी कानपुर से पाकिस्तान के करांची तक प्रदर्शन करती थी। नौटंकी की भाषा में श्रीकृष्ण पहलवान के साथ यासीन खलीफा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस तरह नौटंकी की हाथरस शैली के बाद कनपुरिया शैली ने खूब ख्याति बटोरी। कनपुरिया शैली उत्तर भारत समेत दूर-दूर तक पहचानी गई। यहां के संवाद बेहद चुटीले हुआ करते थे। वर्तमान में भी नौटंकी के आयोजनों में इसकी झलक मिलती है।
वर्तमान पीढ़ी में भी हैं नौटंकी के साधक
वर्ष 2023 में अयोध्या शोध संस्थान के सहयोग से नौटंकी शैली में रामलीला का आयोजन कराने वाले लक्ष्मण अभिनेता डा. दीप कुमार शुक्ल बताते हैं कि वर्तमान में गुलाब बाई की बेटी मधु अग्रवाल नौटंकी कला को आगे बढ़ा रही हैं।वो संस्कृति विभाग से जुड़े कार्यक्रमों में दूर-दूर तक जाती हैं। इसी तरह हरिश्चंद्र नक्कारा बजाते हैं और नौटंकी के आयोजन भी करते हैं।
रमईपुर के मझावन समेत आसपास के गांवों में भी नक्कारा बजाने वाले हैं। इन्हें नौटंकी के आयोजनों में बुलाया जाता है। वे बताते हैं, कनपुरिया शैली की नौटंकी का अंदाज ही कुछ अलग है। किसी समय कलाकारों के आजीविका मुख्य साधन नौटंकी हुआ करती थी। अब धीरे-धीरे आधुनिक परिवेश में मोबाइल फोन, टीवी व सिनेमा के कारण ये विधा गुम हो रही है। नौटंकी में सुल्ताना डाकू, राजा हरिश्चंद्र, दही वाली, फूलन देवी विषय प्रमुख रहे।
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