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    कानपुर दंगे और SP साउथ के गनर की हत्या मामले में 45 आरोपी बरी, चार को जेल; 27 साल बाद आया फैसला

    Updated: Sat, 01 Mar 2025 05:29 PM (IST)

    कानपुर में 27 साल पहले लक्ष्मीपुरवा मस्जिद के इमाम से मारपीट के बाद भड़के दंगों और सिपाही की हत्या के मामले में अपर सत्र न्यायाधीश और त्वरित न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। इस मामले में 60 आरोपित थे जिनमें से 45 आरोपितों को बरी कर दिया गया। चार आरोपितों को आर्म्स एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए तीन-तीन साल की सजा सुनाई गई।

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    कानपुर में 27 वर्ष पूर्व हुए दंगे और सिपाही की हत्या में 45 अभियुक्त बरी। (प्रतीकात्मक तस्वीर) जागरण।

    जागरण संवाददाता, कानपुर। 27 साल पहले चमनगंज इलाके में लक्ष्मीपुरवा मस्जिद के इमाम से मारपीट के बाद भड़के दंगे और सिपाही की हत्या के मामले में अपर सत्र न्यायाधीश और त्वरित न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया। इस मामले में 60 आरोपित थे, जिनमें से 45 आरोपितों को बरी कर दिया गया। जबकि, चार आरोपितों को आर्म्स एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए तीन-तीन साल की सजा और एक-एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

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    27 साल पहले का है मामला

    यह घटना 9 जनवरी 1998 की है, जब रायुपरवा क्षेत्र में एक हिंदू युवक से इमाम की मारपीट के बाद तनाव फैल गया। इस घटना के बाद मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए और पुलिस पर हमला कर दिया। उपद्रवियों ने पत्थर, बम और अवैध असलहों से पुलिस पर फायरिंग की।

    इस फायरिंग में गनर हेड कॉन्स्टेबल कुंवर पाल सिंह को नाक के पास गोली लगी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पुलिस ने 74 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। कुल 77 आरोपितों के खिलाफ आरोप पत्र कोर्ट में पेश किए गए थे।

    सुनवाई के दौरान 13 आरोपियों की हो गई मौत

    मुकदमे की सुनवाई के दौरान 13 आरोपितों की मृत्यु हो गई, जबकि दो आरोपितों की पत्रावली को अलग कर दिया गया। कोर्ट ने आर्म्स एक्ट के तहत इसरार अहमद, मो. सफी, खुर्शीद आलम और आसिफ को दोषी मानते हुए उन्हें तीन-तीन साल की सजा और एक-एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया।

    मामले में अभियोजन पक्ष ने 12 गवाह पेश किए

    इस मामले में अभियोजन पक्ष ने 12 गवाह पेश किए, लेकिन अधिकांश गवाहों ने आरोपितों की पहचान करने से इनकार कर दिया और कहा कि वे बिजली न आने के कारण किसी को पहचान नहीं सके। इसके अलावा, घटना स्थल से मिले बमों के अवशेषों के बावजूद अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि बमों का इस्तेमाल किन दंगाइयों ने किया। साथ ही, गनर की हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार का भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला।

    ज्यादातर गवाह मुकरे, चश्मदीद नहीं

    कोर्ट ने यह माना कि अभियोजन पक्ष आरोपितों पर आरोप साबित करने में सफल नहीं हो सका। बचाव पक्ष के अधिवक्ता शकील बुंदेला ने भी इस बात को स्वीकार किया कि अभियोजन आरोपितों पर आरोप साबित नहीं कर सका। इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जाएगी, जैसा कि जिला शासकीय अधिवक्ता दिलीप अवस्थी ने बताया।

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