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    ये उन दिनों की बात है : कभी शो के लिए टाइम नहीं था, अब शो नहीं होता

    By JagranEdited By:
    Updated: Mon, 07 May 2018 12:52 PM (IST)

    लोगों को स्वस्थ मनोरंजन देने में नौटंकी ने महती भूमिका निभाई है। इसी नौटंकी के विषय में अपने अनुभव बता रहे हैं नक्कारावादक हरिश्चंद्र ...और पढ़ें

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    ये उन दिनों की बात है : कभी शो के लिए टाइम नहीं था, अब शो नहीं होता

    जेएनएन, कानपुर : कभी शादी-समारोह या कोई आयोजन हो तो नौटंकी शान होती थी। नक्कारे की आवाज ही भीड़ जुटाने के लिए काफी होती थी, लेकिन अब वह दिन नहीं रहे। कभी हम लोग शो के लिए टाइम नहीं दे पाते थे और अब हम शो के लिए तरसते हैं।

    अब तो नौटंकी के नाम पर मात्र डांस रह गया है, जिसमें अधिकांश अश्लीलता ही परोसी जा रही है। हम लोग हमीरपुर के रहने वाले थे। हमारे चाचा नक्कारा बजाते थे। हमें यह कला पसंद आई। हमने इसे अपनाया। तब नक्कारा नौटंकी की शान होती थी। हमने केंद्र संगीत नाटक कला अकादमी और उत्तर प्रदेश संगीत नाटक कला अकादमी से प्रशिक्षण लिया। कानपुर के प्रसिद्ध नक्कारा वादक उस्ताद रशीद खान वारसी हमारे गुरु रहे हैं। जब हम युवा थे तो नौटंकी आयोजनों की शान होती थी। हमारी मंडली जाती थी। लोग एक-एक संवाद पर इनाम देते थे। कभी-कभी इसकी प्रतियोगिता सी हो जाती थी। अब कानपुर या आसपास के क्षेत्रों में तो यह कला विलुप्त सी हो गई। नौटंकी का कथानक लिखने वाले सिद्धेश्वर अवस्थी ने हमें गुलाब बाई से मिलवाया था जहां से मैं इस क्षेत्र में आया। ऐसा नहीं कि यह कला अब आगे नहीं बढ़ सकती, लेकिन इसके लिए सरकार को आगे आना होगा। हाथरस क्षेत्र में यह कला अब भी आम लोगों के बीच जीवित है। लखनऊ की रहने वाली पूर्वा नरेश ने अभी एक बंदिश नाम कथानक लिखा। इसके कोलकाता, मुंबई, चंडीगढ़ गोवा में करीब 16 शो किए। अब नौटंकी प्रशिक्षण केंद्र से हम नए कलाकारों को उभार रहे हैं। अब पीर मोहम्मद, रोहतगी, मनोज कपूर आगे आ रहे हैं, इसे आगे बढ़ाने के लिए। अभी हम लोगों ने मर्चेट चेंबर में सुल्ताना डाकू की नौटंकी खेली थी। पूरा हाल खचाखच भरा था। इससे उम्मीद जगी है।