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Diwali Special: बताशा, गट्टा और शक्कर के हाथी-घोड़े... कानपुर की 200 साल पुरानी परंपरा के मुरीद हैं कई राज्य

Published: Fri, 06 Nov 2026 10:52 PM (IST)

कानपुर में दीपावली के लिए 200 साल पुरानी शक्कर के खिलौने, बताशे और गट्टे बनाने की परंपरा आज भी कायम ...और पढ़ें

बिक्री के लिए तैयार रखे शक्कर के खिलौने। जागरण

बिक्री के लिए तैयार रखे शक्कर के खिलौने। जागरण

HighLights

  1. कानपुर में 200 साल पुरानी शक्कर के खिलौने बनाने की परंपरा।

  2. दीपावली पर उत्तर प्रदेश से बिहार तक इनकी भारी मांग।

  3. हाथी, घोड़े जैसे आकार में बनते हैं ये पारंपरिक खिलौने।

स्नेहा दुबे, कानपुर। दीपावली की पूजा में जब घरों में लाई, खील और बताशों के साथ शक्कर के खिलौने सजते हैं तो बच्चों के चेहरे भी खिल उठते हैं। हाथी, घोड़ा, गुड़िया और चिड़िया जैसे आकार वाले ये खिलौने केवल मिठाई नहीं, बल्कि त्योहार से जुड़ी बचपन की यादें और परंपरा भी हैं। यही वजह है कि बदलते समय में भी दीपावली पर इनकी खरीदारी का उत्साह कम नहीं हुआ है। प्रस्तुत है दैनिक जागरण संवाददाता की विशेष रिपोर्ट...


नगर में शक्कर के खिलौने बनाने का काम दशकों से पारंपरिक रूप में चला आ रहा है। हूलागंज बाजार और हरबंश मोहाल में करीब 200 साल पुरानी दुकानें आज भी हैं, जहां शक्कर के खिलौनों के साथ गट्टा, बताशे और रेवड़ी भी तैयार की जाती हैं। दीपावली के एक-दो महीने पहले ही यहां के कारखानों में खिलौने बनाने का काम शुरू हो जाता है। कारीगर दिन-रात मेहनत कर अलग-अलग आकार के खिलौने तैयार करते हैं। त्योहार से कुछ दिन पहले थोक खरीदारों की आवाजाही बढ़ जाती है। धनतेरस पर यहां सबसे अधिक खरीदारी होती है।

खास बात यह है कि शक्कर के खिलौनों का निर्माण कानपुर में होता है और यहां से इनकी आपूर्ति प्रदेश के विभिन्न जिलों तक की जाती है। आसपास के जिलों के अलावा बिहार तक के व्यापारी यहां से खिलौने खरीदकर ले जाते हैं। थोक व्यापारी इन्हें छोटी दुकानों, मेलों और फुटकर विक्रेताओं तक पहुंचाते हैं। इस तरह कानपुर की यह पारंपरिक मिठाई दूसरे शहरों में भी दीपावली की मिठास घोलती है।

हरबंश मोहाल में बताशे, गट्टे, रेवड़ी और शक्कर के खिलौना के कारखाने के संचालक अमित कश्यप बताते हैं कि उनके कारखाने में शक्कर के खिलौनों के अलावा रेवड़ी और गट्टा भी तैयार किया जाता है। वहीं, दूसरे पर ऐसे ही कारखाने के संचालक सूरज ने बताया कि दीपावली के लिए विशेष मांग को देखते हुए पहले से ही उत्पादन शुरू कर दिया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों के व्यापारियों के आर्डर के अनुसार माल तैयार कर बाहर भेजा जाता है। पूजा में इस्तेमाल होने के साथ ही बच्चे और बड़े भी इन खिलौनों को बड़े चाव से खाते हैं। यही वजह है कि हर साल त्योहार पर इनकी मांग बनी रहती है।

सांचों में ढलकर तैयार होती है मिठास

शक्कर के खिलौने बनाने की प्रक्रिया भी खास होती है। सबसे पहले बड़ी कढ़ाही में चीनी और पानी मिलाकर तेज आंच पर पकाया जाता है। इसे लगातार उबालकर गाढ़ी चाशनी तैयार की जाती है। इसके बाद चाशनी को हाथी, घोड़े, गुड़िया, चिड़िया और स्टार जैसे आकार वाले विशेष सांचों में डाला जाता है। दो से तीन घंटे में चाशनी जमकर सफेद शक्कर के खिलौने का रूप ले लेती है। पारंपरिक तौर पर कहीं मिट्टी तो कहीं नक्काशीदार लकड़ी के सांचों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह कारीगरों की मेहनत और पारंपरिक हुनर से तैयार ये खिलौने दीपावली की पूजा की थाली का खास हिस्सा बन जाते हैं।

थोक और फुटकर में अलग-अलग दाम

  • थोक कीमत: 60 से 80 रुपये प्रति किलो
  • फुटकर कीमत: 100 से 150 रुपये प्रति किलो
  • कीमतों में अंतर: अलग-अलग क्षेत्रों और बाजारों के अनुसार दाम घटते-बढ़ते हैं।
  • खरीदार: कानपुर के अलावा आसपास के जिलों और बिहार तक के व्यापारी थोक में खरीदारी करते हैं।

 

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