एंटीबायोटिक का अधिक सेवन कर रहा बैक्टीरिया के जीन में बदलाव, RMRC अध्ययन में खुलासा
एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग से बैक्टीरिया अपने जीन में बदलाव कर रहे हैं, जिससे दवाएं निष्प्रभावी हो रही हैं। गोरखपुर के क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंध ...और पढ़ें

निमोनिया के बैक्टीरिया 'स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिएई' की आरएमआरसी ने की जीनोम सिक्वेंसिंग। सांकेतिक तस्वीर
गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और अनियंत्रित उपयोग ने एक गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे दिया है। दवाओं के अत्यधिक सेवन के कारण बैक्टीरिया अपने जीन में बदलाव कर रहे हैं, जिससे एंटीबायोटिक धीरे-धीरे निष्प्रभावी होती जा रही हैं।
क्षेत्रीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान केंद्र (आरएमआरसी) के एक अध्ययन में इसकी पुष्टि हुई है। अध्ययन के दौरान जब निमोनिया पैदा करने वाले बैक्टीरिया 'स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिएई' की जीनोम सिक्वेंसिंग की गई तो यह सामने आया कि बैक्टीरिया के जीन के उस हिस्से में बदलाव आ चुका है, जिस पर जाकर एंटीबायोटिक असर करती थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। चिकित्सकों द्वारा बिना ठोस आवश्यकता के एंटीबायोटिक लिखने और आम लोगों द्वारा सामान्य बीमारियों में खुद ही एंटीबायोटिक का सेवन करने से बैक्टीरिया में ड्रग रेजिस्टेंस विकसित हो रहा है। परिणामस्वरूप, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ता है और एंटीबायोटिक की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब ये दवाएं असर नहीं दिखा पातीं।
इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) की गोरखपुर शाखा आरएमआरसी में निमोनिया पर किए जा रहे अध्ययन के प्रारंभिक चरण में यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) के करीब 600 रोगियों के पर्चों की जांच की गई। इसमें पाया गया कि लगभग सभी रोगियों को एंटीबायोटिक लिखी गई थी।
यह भी पढ़ें- गोरखपुर में नए साल के जश्न में नशे ने बिगाड़ा खेल, 41 पहुंचे अस्पताल
इनमें 72 प्रतिशत पर्चों पर एजिथ्रोमाइसिन और शेष पर एमोक्सिसिलिन लिखी गई थी। हैरानी की बात यह रही कि वायरल फीवर जैसे रोगों में भी एंटीबायोटिक लिखी गई थी, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक की कोई भूमिका नहीं होती।
इतना ही नहीं, कुछ बाल रोगियों के पर्चों पर 500 एमजी एजिथ्रोमाइसिन लिखी गई, जबकि उनकी उम्र और वजन के अनुसार 250 एमजी की ही आवश्यकता थी। अनावश्यक डोज भी बैक्टीरिया में रेजिस्टेंस बढ़ाने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
आइसीएमआर के एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 75 से 91 प्रतिशत तक बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। इस बढ़ते खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी चिंता व्यक्त की है।
आइसीएमआर की नवंबर में जारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने 28 दिसंबर को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध उपयोग पर लोगों को सचेत किया। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि एंटीबायोटिक कोई त्वरित समाधान नहीं हैं और इनका उपयोग केवल चिकित्सकीय सलाह पर ही किया जाना चाहिए।
यदि समय रहते एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में साधारण संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं। इसलिए चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और आम जनता, सभी को इस खतरे के प्रति जागरूक होना होगा।
-डा. हरिशंकर जोशी, निदेशक आरएमआरसी
एंटीबायोटिक रेजीस्टेंस का सबसे बड़ा कारण अनावश्यक रूप से इसका उपयोग है। सीएचसी-पीएचसी पर डाक्टर भी धड़ल्ले से एंटीबायोटिक लिख रहे हैं। आम आदमी सर्दी-जुकाम में भी अपने मन से मेडिकल स्टाेरों से एंटीबायोटिक लेकर खा रहा है। इसे रोकना होगा।
-डा. अशोक पांडेय, वायरोलाजिस्ट आरएमआरसी

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।