गोरखपुर सबरंग: क्षय रोग से संघर्ष की मिसाल थे प्रतिष्ठित बैरिस्टर चारुचंद्र दास, नाम जिससे सड़क को मिली पहचान
गोरखपुर के प्रतिष्ठित बैरिस्टर चारुचंद्र दास क्षय रोग से अपनी लड़ाई और समाज में अपने योगदान के लिए जाने जाते थे। उनके सम्मान में एक सड़क का नामकरण किया गया, जो उन्हें एक स्थायी पहचान दिलाता है। उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई।

सड़क और चारुचंद्र दास। जागरण
डॉ. राकेश राय, गोरखपुर। फिराक चौराहे से छात्रसंघ चौराहे की ओर जाने वाली सड़क से शहर की जिन शख्सियतों का नाम जुड़ता है, चारुचंद्र दास उनमें से एक और प्रमुख थे। दीवानी कचहरी के दक्षिणी गेट के सामने उनके नाम पर बसी शहर की सबसे पुरानी प्रतिष्ठित कालोनी सड़क की जान है और पहचान भी। इस सड़क से गुजरने वाले लोग सलीके से बसी इस कालोनी को निहारते हैं।
उसके बहाने सम्मान के साथ चारुचंद्र का नाम लेते हैं। पर चाहकर भी उनके बारे में जान नहीं पाते हैं। इसलिए कि चारुचंद्र की शख्सियत को बताने वाले उन्हें चाहकर भी नहीं मिल पाते। नाम से सड़क की पहचान की श्रृंखला में हम लोगों की इस उत्कंठा को शांत करेंगे। उन्हें चारुचंद्र दास की की शख्सियत के बारे में विस्तार से बताएंगे। शहर को उनके योगदान की जानकारी से समृद्ध करेंगे।
चारुचंद्र दास शहर के प्रतिष्ठित बैरिस्टर और विधिवेत्ता थे। उनके जन्म के बारे बहुत जानकारी तो नहीं मिलती लेकिन निधन की तिथि व वर्ष से उनके जन्म का वर्ष 1879 निकलता है। चारुचंद्र जितना अपने विधि व्यवसाय के लिए जाने गए, उतना ही क्षय रोग से लड़ने के लिए भी पहचाने गए। युवावस्था में ही वह क्षय रोग से पीड़ित हो गए। यह वह समय था, जब क्षय रोग लाइलाज हुआ करता था।
इस रोग को जानलेवा माना जाता था। लंबे समय तक उन्होंने क्षय रोग से संघर्ष किया। स्थानीय व देश के प्रतिष्ठित चिकित्सकों की सलाह पर चिकित्सा के लिए तीन बार यूरोप भी गए। यूरोप के चिकित्सकों ने जब उन्हें यह बताया कि क्षय रोग पीढ़ियों तक चलता है तो उन्होंने निसंतान रहने का निर्णय लिया और युवावय में ही नसबंदी करा ली।
विधि व्यवसाय में प्रतिष्ठा पाने के साथ क्षय रोग से उनका संघर्ष लंबा चला। इस क्रम में उन्हें एक हाथ और एक पैर भी गंवाना पड़ा। उन्होंने क्षय रोग से खुद ही संघर्ष नहीं किया, बल्कि अन्य लोगों की इस रोग से लड़ने में मदद की। इसके लिए उन्होंने अपने नाम से ट्रस्ट की स्थापना की। शहर के तत्कालीन प्रमुख चिकित्सक डा. केएन लाहिड़ी को ट्रस्ट सचिव बनाया। 26 अगस्त को अपनी लाखों की संपत्ति वसीयत के जरिये ट्रस्ट को दे दी।
अंत में क्षय रोग से लड़ते-लड़ते 64 वर्ष की आयु में 1943 में उनका निधन हो गया। उन्होंने गोरखपुर में ही अंतिम सांस ली। उनके निधन के दस साल बाद डा. केएन लाहिड़ी के अथक प्रयास से ट्रस्ट का संचालन शासन के पास चला गया। इस क्रम में प्रदेश के समाज कल्याण विभाग ने अपने स्तर से ट्रस्ट की कार्य प्रणाली निश्चित की और ट्रस्ट की संपत्ति धर्मादा संस्थान इलाहाबाद में निहित कर दी।
ट्रस्ट की ओर से गोरखपुर में चारुचंद्र दास की छह एकड़ भूमि पर चारुचंद्र दास मेमोरियल टीबी क्लीनिक का निर्माण कराया गया, जिसका उद्घाटन 26 जून 1996 में तत्कालीन मंडलायुक्त हरिश्चंद्र ने कराया गया।
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प्रदेश स्तर के विधिवेत्ता थे चारुचंद्र
उन दिनों पिछड़े जिले गोरखपुर को सम्मान दिलाने वाले प्रसिद्ध नागरिकों में चारुचंद्र दास का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आकर्षक व्यक्तित्व, विश्लेषण की बेजोड़ प्रतिभा, कानून के गहन ज्ञान और ठोस तर्क देने की क्षमता वाले बैरिस्टर चारुचंद्र प्रदेश के शीर्ष कानून के जानकारों में अपनी पहचान रखते थे। उनकी कानूनी प्रतिभा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय और यहां तक कि प्रिवी काउंसिल ने भी मान्यता दी थी, जिसकी प्रशंसा उसके एक फैसले में आज भी दर्ज है।
नोटिफ़ाइड एरिया कमेटी, जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी हुआ करते थे, उसे बतौर उपाध्यक्ष चारुचंद्र ही संचालित करते थे। सेंट एंड्रयूज कालेज की कार्यकारिणी में उन्हें सम्मानित व मजबूत स्थान प्राप्त था। विधि व्यवसाय से जुड़े लोग आज भी चारुचंद्र दास का नाम पूरे सम्मान से लेते हैं। बतौर कानूनविद उनकी क्षमता को याद करते हैं।

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