यूपी के इस शहर में पराली से बन रहे कंबल, पर्यावरण संरक्षण के अनोखे प्रयोग ने खोली स्वावलंबन की राह
एटा के सकीट क्षेत्र में मां दुर्गा महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने पराली से पशुओं के लिए कंबल बनाकर पर्यावरण संकट को अवसर में बदला है। नीतू देवी ...और पढ़ें
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योगेश कुमार, एटा। पराली जलाने से उपजता पर्यावरण संकट लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। ऐसे में सकीट क्षेत्र के आसपुर गांव की महिलाओं ने इस समस्या को अवसर में बदलकर एक नई मिसाल कायम की है। मलावन ब्लाक की मां दुर्गा महिला स्वयं सहायता समूह की पहल ने पराली के उचित निस्तारण के साथ साथ महिला स्वावलंबन की मजबूत राह खोल दी है।
समूह की सदस्य नीतू देवी ने पराली से पशुओं के लिए कंबल तैयार करने का अभिनव प्रयोग शुरू किया।
जूट के पुराने बोरों में पराली भरकर, धागे से सिलाई कर कंबल तैयार किए जा रहे हैं। ये कंबल सर्दी के मौसम में गोशालाओं और पशुशालाओं में बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं। अब तक समूह की महिलाएं 20 कुंतल से अधिक पराली का निस्तारण कर चुकी हैं और तैयार कंबल जिले की गोशालाओं के साथ साथ आसपास के जिलों में भी भेजे जा चुके हैं।
इस अभिनव प्रयास की शुरुआत सितंबर माह में उस समय हुई, जब प्रशासन पराली के उचित निस्तारण की रणनीति बना रहा था। इसी दौरान मुख्य विकास अधिकारी डा. नागेंद्र नारायण मिश्र मलावन गोशाला के निरीक्षण पर पहुंचे। क्षेत्र में धान की खेती और पराली की अधिकता को देखते हुए, सर्दी के मौसम में पशुओं को बचाने के लिए पराली से कंबल बनाने का सुझाव सामने आया।
नीतू देवी ने संभाली जिम्मेदारी
इस पहल को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी नीतू देवी ने संभाली। शुरुआत में गोशाला में मौजूद करीब 450 पशुओं के लिए कंबल तैयार किए गए। काम सरल था, लागत लगभग शून्य के बराबर। पराली मुफ्त में उपलब्ध हो गई और जूट के निष्प्रयोज्य बोरे बाजार से जुटा लिए गए। पहले महनताना के आधार पर कंबल बनाए गए, बाद में इसे समूह की नियमित आजीविका का माध्यम बना लिया गया।
परियोजना की सफलता देख क्षेत्र के ओम साईं और परी महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी इससे जुड़ गईं। पराली से बने कंबलों का प्रचार प्रसार बढ़ा तो जिले की अन्य गोशालाओं और निजी पशुशालाओं से भी आर्डर मिलने लगे। प्रशासनिक स्तर पर पहल को प्रोत्साहन मिलने के बाद अलीगढ़ और हाथरस तक से मांग शुरू हो गई।
चार महीने की सीमित अवधि में ही समूह ने 20 कुंतल से अधिक पराली का उपयोग कर लिया। नीतू देवी के अनुसार पहले ही सीजन में बिना लागत के इस काम से प्रत्येक महिला को सात से आठ हजार रुपये प्रतिमाह की औसत आय हुई। समय कम होने के बावजूद इस वर्ष आठ से दस हजार कंबल तैयार होने का अनुमान है। अगले वर्ष इस पहल को और व्यापक स्तर पर ले जाने की तैयारी है।
क्या बोलीं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ब्लाक समन्वयक?
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ब्लाक समन्वयक वीना शर्मा बताती हैं कि समूह पहले से गोबर से काष्ठ निर्माण जैसे पर्यावरण हितैषी कार्य कर रहा है। पराली से कंबल निर्माण ने न सिर्फ आमदनी बढ़ाई है, बल्कि पराली जलाने की समस्या के समाधान में भी योगदान दिया है।
सीडीओ डा. नागेंद्र नारायण मिश्र कहते हैं पराली से कंबल बनाने का यह अभिनव प्रयोग महिला समूहों ने सफल कर दिखाया है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं को आय का सशक्त जरिया मिला है। भविष्य में इसे मांडल के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक पराली का निस्तारण हो सके।

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