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चित्रकूट के ऐतिहासिक गधा मेले में बिकेंगे शाहरुख-कैटरीना, औरंगजेब के समय से जुड़ाव, धनतेरस से जुटेंगे खरीदार और पशु व्यापारी

Published: Tue, 03 Nov 2026 10:58 PM (IST)

चित्रकूट के ऐतिहासिक गधा मेले में दीपावली अमावस्या पर शाहरुख-कैटरीना जैसे फिल्मी सितारों के नाम वाले गधे बिकते हैं, जिनकी ...और पढ़ें

मंदाकिनी तट पर लगा गधों का मेला। फाइल फोटो

मंदाकिनी तट पर लगा गधों का मेला। फाइल फोटो 

HighLights

  1. दीपावली अमावस्या पर चित्रकूट में लगता है गधा मेला

  2. फिल्मी सितारों के नाम वाले गधों की रहती है अधिक मांग

  3. औरंगजेब के समय से जुड़ा है इस मेले का इतिहास

हेमराज कश्यप, चित्रकूट। दीपावली अमावस्या पर पांच दिवसीय मेले में मंदाकिनी तट पर सजने वाला गधों का मेला अनूठा अंदाज लिए धनतेरस से सजेगा। यहां दुकानें नहीं, बल्कि कतारों में खूंटे पर बंधे गधे व खच्चर खरीदारों का इंतजार करते हैं।

इनकी खूबियां दलाल बताते हैं। कोई नस्ल की तारीफ करता है तो कोई ताकत व चाल का बखान कर ग्राहक को आकर्षित करता है। इसके बाद शुरू होती है बोली, जिसमें 1000 से लेकर दो लाख रुपये तक दाम लगते हैं। कभी-कभी बोली पांच लाख रुपये तक पहुंच जाती है।

मेला संचालक मुन्ना मिश्रा ने बताया कि अंतरराज्यीय बाजार में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तराखंड के अलावा नेपाल से करीब 300 व्यापारी आते हैं। धनतेरस से व्यापारी जुटने लगते हैं। अच्छी नस्ल के गधों को बालीवुड सितारे शाहरुख, सलमान, अक्षय, रणवीर, ऋतिक, कैटरीना व करिश्मा के साथ कई नेताओं के नाम दिए जाते हैं। उनकी मांग अधिक रहती है।

आनलाइन युग में इस बाजार में अभी पुरानी व्यवस्था लागू है। मध्य प्रदेश के सतना जिला अंतर्गत चित्रकूट क्षेत्र की नगर पालिका नयागांव की ओर से बिक्री पर टैक्स वसूली के लिए इस वर्ष एक लाख रुपये में ठेका दिया गया है। ठेकेदार व्यापारी का पंजीकरण करते हैं। पशु बांधने के लिए प्रति खूंटा 50 रुपये व प्रति जानवर 500 रुपये प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

संचालक ने बताया कि वर्तमान में ई-रिक्शा, लोडर व दूसरे हल्के व्यावसायिक वाहनों के बढ़ते प्रयोग के कारण गधों की मांग कम हुई है। द्वारिकापुरी निवासी लाल बहादुर ने बताया कि तीन साल पहले उनके पास 20 गधे थे, लेकिन काम कम मिलने व खर्च अधिक होने के कारण अब केवल पांच रह गए हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस गधा मेला की शुरुआत मुगल शासक औरंगजेब ने कराई थी। सेना में घोड़ों की कमी हो गई थी। उनकी भरपाई के लिए अफगानिस्तान से अच्छी नस्ल के गधे व खच्चर मंगवाए गए और उन्हें सेना में शामिल किया गया था।

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