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    कल्याण सिंह जयंती विशेष: सियासत में अडिग निर्णय और अटूट निष्ठा वाले जननायक, 'जो कहा, सो किया'

    Updated: Mon, 05 Jan 2026 09:23 AM (IST)

    पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जयंती पर यह लेख उनके अडिग राजनीतिक जीवन को दर्शाता है। छात्र जीवन से संघ से जुड़कर, उन्होंने अपनी शर्तों पर राजनीति क ...और पढ़ें

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    कल्याण सिंह। फाइल

    जागरण संवाददाता, अलीगढ़। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के सियासत के ऐसे मझे हुए नेता थे, जिन्होंने जिस ओर कदम बढ़ा दिए फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। हानि, लाभ की चिंता नहीं की। सियासत में न तो कभी झुके और न समझौता किया। अपनी शर्तों पर राजनीति की। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी को त्याग दिया। पूर्व मुख्यमंत्री का 94वां जन्मदिवस है। मुख्य आयोजन लखनऊ में होगा।

    राजनीतिक शुरुआत संघर्षों से भरी रही

    कल्याण सिंह की राजनीतिक शुरुआत संघर्षों से भरी रही। छात्र जीवन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। 1950 के दशक में शिक्षक से राजनीति में प्रवेश कर गए। परिवार में राजनीति से कोई था नहीं, इसलिए संघर्ष को स्वीकार किया और सियासी मैदान में कूद पड़े। पहले चुनाव में हार हुई, मगर दूसरे चुनाव में 1967 में ही प्रतिद्वंद्वी को पटकनी दे दी। यहीं से कल्याण सिंह की राजनीति का सूरज उदय हुआ। फिर जीवन भर सियासी सूरज की चमक कम नहीं होने दी। राजनीति में शुरुआती दौर में बाबूजी ने साइकिल से प्रचार किया।

    साइकिल से जाते थे गांवों में

    गांव−गांव साइकिल से वो जाया करते थे। संघ से जुड़े होने के चलते राजनीति भी जनसंघ से शुरू की। जिस जमाने में कांग्रेस का बोलबाला हुआ करता था उस समय कल्याण सिंह डटकर ताल ठोकर मैदान में डट गए। ये स्थिति थी कि जनसंघ का नाम सुनकर लोग चुनाव में चंदा भी नहीं देते थे, मगर कल्याण सिंह की सियासत में निष्ठा, ईमानदारी को देखकर कुछ लोग मदद को आगे आ जाया करते थे। तमाम जगहों पर तो पैदल ही संपर्क पर निकलते थे।

    बारहद्वारी, रामघाट रोड आदि जगहों पर पैदल निकलते और सभी को राम राम लेते निकल जाया करते थे। कार्यकर्ताओं के बीच में ही बैठकर बातचीत और चर्चाएं शुरू कर देते थे। इसलिए उनसे हर कार्यकर्ता जुड़ा हुआ महसूस करता था।

    संघ के प्रति अटूट निष्ठा

    1980 के दशक में नौरंगाबाद स्थित डीएवी कालेज में लगने वाली शाखा में भी वह आ जाया करते थे। उनके आने से स्वयंसेवक सतर्क हो जाते थे मगर बाबूजी हंसी मजाक और बातचीत शुरू करके माहौल को हल्का कर दिया करते थे। संघ के प्रति उनकी अटूट निष्ठा थी। क्योंकि अतरौली से संघ के प्रचारक के ही कहने पर उन्होंने सियासी पारी की शुरुआत की थी।

    जो कहा सो किया ...


    धीरे धीरे सियासत में बाबूजी आगे बढ़ते गए। राम मंदिर आंदोलन के समय निर्भीक निर्णय से वह पूरी दुनिया में विख्यात हो गए। उन्होंने विवादित ढांचे की जिम्मेदारी लेते हुए सीएम की कुर्सी छोड़ दी। इसलिए सियासत में कल्याण सिंह के मायने होने लगे। अयोध्या में ढांचा गिरने के बाद प्रदेश में हुए उप चुनाव में भाजपा ने एक पोस्टर जारी किया था। उस पर लिखा स्लोगन जो कहा, सो किया.. पार्टी का प्रतीक चिह्न था। तब बाबूजी ह्दय सम्राट की छवि में उभरकर आए।