Sir Syed Day 2022 : नौरंगीलाल में पढ़कर सर सैयद के पुत्र बने थे इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले जज
अंग्रेजी हुकूमत में शिक्षण संस्थानों में नौरंगीलाल राजकीय इंटर कालेज की बड़ी पहचान थी। एएमयू की स्थापना से पहले सर सैयद अहमद खां ने अपने दोनों पुत्रों को इसी विद्यालय में पढ़ाया था। नौरंगीलाल इंटर कालेज की स्थापना 1852 में मिडिल स्कूल के तौर पर हुई थी।

अलीगढ़, जागरण संवाददाता। Sir Syed Day 2022 : ब्रिटिश शासन काल में नौरंगीलाल राजकीय इंटर कालेज की शिक्षण संस्थानों में बड़ी पहचान थी। एएमयू की स्थापना से पहले सर सैयद अहमद खां ने अपने दोनों पुत्रों को भी इसी विद्यालय में पढ़ाया था। यहां पढ़े उनके पुत्र मोहम्मद महमूद तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के पहले भारतीय जज बने।
1852 में हुई थी नौरंगीलाल इंटर कालेज की स्थापना
नौरंगीलाल इंटर कालेज की स्थापना 1852 में मिडिल स्कूल के तौर पर हुई थी। 1874 में हाईस्कूल व 1964 में इंटरमीडिएट की मान्यता मिली। 1968 में एनएसएस मिली। एएमयू के इतिहास के जानकार डा. राहत अबरार ने बताया कि अलीगढ़ में न्यायिक सेवा के दौरान 1864 से 1867 तक सर सैयद अहमद खां ने अपने बेटे सैयद हामिद व सैयद महमूद को यहीं पढ़ाया था। तब अलीगढ़ में यही प्रमुख शैक्षणिक संस्थान होता था।
आपको बाबा के कालेज जाना है
वीमेंस कालेज की स्थापना करने वाले शेख मोहम्मद पापा मियां 1894 या 95 में ट्रेन से अलीगढ़ आए थे। उन्हें मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कालेज जाना था। कुली उनको मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कालेज न ले जाकर नौरंगीलाल राजकीय इंटर ले गया। वहां जाकर पता चला कि वह गलत आ गए हैं। तब कुली ने कहा, अच्छा आपको बाबा के कालेज जाना है। तब उसने पापा मियां को वहां पहुंचाया। जीआसी में छात्रावास होता था। सर सैयद जिस इंस्टीट्यूट गजट को निकालते थे, उसका अंग्रेजी में संपादन इसी कालेज में उस समय के प्रिंसिपल कैडी करते थे।
राजा महेंद्र प्रताप ने भी की थी पढ़ाई
राजा महेंद्र प्रताप को गोद लेने के वाले हाथरस के राजा घनश्याम सिंह ने उन्हें पढ़ने के लिए 1895 में नौरंगीलाल राजकीय इंटर कालेज भेजा था। सर सैयद अहमद खां और घनश्याम सिंह में दोस्ती थी। सर सैयद ने राजा महेंद्र प्रताप को एमएओ कालेज में पढ़ाने का आग्रह किया था। इसके बाद महेंद्र प्रताप का एएमयू कालेज में दाखिला हुआ। राजा को चार कमरों का बंगला छात्रावास के रूप में दिया गया। दो कमरों में उनके दस नौकर रहते थे। राजा ने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है।
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आत्मकथा में लिखी बीए की डिग्री न लेने की बात
उन्होंने लिखा है कि जब वे क्लास लेने जाते थे, तब नौकर किताब लेकर चलते थे। कक्षा तीन में दूसरा स्थान हासिल करने पर राजा को सम्मानित किया गया। पांचवीं में उन्हें शिक्षक से मार भी खानी पड़ी। कक्षा 8 व 12 में फेल भी हुए। पिता की मौत के कारण राजा को रियासत संभालनी पड़ी और 12वीं के बाद 1907 में कालेज छोड़ दिया। बीए की डिग्री न लेने की बात भी उन्होंने आत्मकथा में लिखा है
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