श्रीगोदारंगमन्नार ने दिए श्रीशेषजी पर दर्शन, रजवाड़ों से लेकर यूरोपियन तक रहे हैं अनूठे मेले के दीवाने
छह दिवसीय आयोजन में उमड़़ रहा है भक्त सैलाब। 18 को रथ मेला के साथ समापन होगा रंगजी मंदिर के ब्रह्मोत्सव। ...और पढ़ें

मथुरा, जेएनएन। श्रीनारायण के जितनेे रूप हैं उतने ही उनके अनूठे नाम हैं। जैसा भक्त वैसे ही उसके भगवान। दक्षिण भारतीय परंपरा के रंगजी मंदिर की भी है अनूठी शान। 12 मार्च से चल रहे ब्रह्मोत्सव में रविवार को श्रीगोदारंगमन्नार भगवान ने चांदी के श्रीशेष जी पर दर्शन दिए तो भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा।
रविवार की सुबह चांदी के श्रीशेषजी पर विराजमान होकर भगवान श्रीगोदारंगमन्नार नगर भ्रमण को निकले तो शाम को कल्पवृक्ष पर भक्तों को दर्शन दिए। भगवान श्रीगोदारंमन्नार का दर्शन करने को श्रद्धालुओं का हुजूम सड़कों पर आ गया। शोभायात्रा में बैंडबाजों की धुन पर श्रद्धालुओं ने जमकर नृत्य किया तो जगह-जगह भगवान की आरती उतारकर आराध्य के प्रति श्रद्धालुओं ने अपनी आस्था जताई।
रंगजी मंदिर से मंगलवार की सुबह 8 बजे भगवान श्रीगोदारंगन्नार चांदी के श्रीशेषजी पर विराजमान हुए। ठाकुरजी के विराजमान होते ही भक्तों ने जयकारे लगाए तो वातावरण गुंजायमान हो उठा। धीरे-धीरे ठाकुरजी की सवारी मंदिर से बाहर निकली। जहां भक्तों का हुजूम दर्शन के लिए पहले से ही खड़ा था। मुख्य द्वार पर पहुंचते ही भगवान की आरती उतारने को भक्तों की लंबी कतार लग गई। रंगजी मंदिर से शुरू हुई सवारी नगर पालिका चौराहा होते हुए बड़ा बगीचा पहुंची। जहां विश्राम के बाद सेवायतों ने उनकी आरती उतारी और सवारी पुन: मंदिर को लौटी।

ये है रथ मेला का इतिहास
दक्षिण भारतीय परंपरा के रंगजी मंदिर में चल रहे ब्रह्मोत्सव का मुख्य आकर्षण है रथ का मेला। करीब 60 फुट लंबे विशालकाय रथ में विराजमान होकर जब भगवान श्रीगोदारंगमन्नार भ्रमण को निकलते हैं तो पूरा ब्रज ही नहीं अपितु आसपास के प्रांतों से भी श्रद्धालु दर्शन करने को उमड़ते हैं। रथ का मेला मंदिर निर्माण के समय से ही लोकप्रिय रहा है। मेले की रौनक जितनी आज है, उतनी ही रौनक शुरूआती दौर में भी थी। बढ़ती आबादी से भीड़ में भले ही इजाफा हुआ हो, लेकिन रथ के मेला की लोकप्रियाता में कमी नहीं आई। रथ के मेले ने स्थानीय लोग ही नहीं ग्रामीण व सुदूर क्षेत्र के श्रद्धालु और यूरोपियन को आकर्षित किया। ब्रिटिश काल में रथ के मेले का आकर्षण ऐसा था कि ब्रिटिश अफसर भी मेले का नजारा लेने आते थे।

आम नहीं खास भी मेले के मुरीद
रंगजी मंदिर के श्रीब्रह्मोत्सव पुस्तक के लेखक डॉ. राजेश शर्मा बताते हैं इस मेले के मुरीद आम और खास सभी थे। वह शुरूआती दौर था जब भरतपुर महाराज का सैनिक दस्ता और बैंड का प्रदर्शन करता था। स्थानीय तीर्थ पुरोहित परिवार की पुस्तैनी बहियां भी इसकी लोकप्रियता की साक्षी हैं। आजादी से पहले रजवाड़े भी इस ब्रह्मोत्सव को देखने आते थे। विक्रम संवत 1981, सन् 1924 में अशोथर जिला फुलेपुर रियासत के राजा अपने बिल्लेदार सहित ब्रह्मोत्सव देखने आए। जिसका विवरण कालीयमर्दन मंदिर के सेवायत उमाशंकर पुरोहित की पुस्तैनी बहियों में दर्ज है। तो बीसवीं शताब्दी में बुंदेलखंड के प्रतापी राजा छत्रसाल बुंदेला की पीढ़ी में रानी कमल कुंवरि ने भी इसका उल्लेख अपनी वृंदावन यात्रा के दौरान किए गए विवरण में दिया है। रथ के मेले की ख्याति को देख एफएस ग्राउस ने भी इसकी जानकारी मथुरा ए डिस्ट्रिक्ट मैमोयर में दी है। ग्राउस रथ मेला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी पुस्तक में न केवल इसका उल्लेख किया। बल्कि इसका चरित्र वर्णन भी किया। ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के संग्रह में सुरक्षित यह वह दुर्लभ फोटो है, जो इस उत्सव का पहली बार कैमरे से खींचा गया था। सन् 1880 के लगभग मथुरा के तत्कालीन अंग्रेज जिलाधिकारी एवं पुरातत्वविद् एफएस ग्राउस के निर्देशन में लिया गया ये चित्र ग्राउस ने अपनी पुस्तक मथुरा ए डिस्ट्रिक्ट मेमोयर में प्रकाशित कर रथ के मेला का तत्कालीन आंखों देखा सजीव वर्णन किया है।

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