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    Cheeni Ka Roja:आगरा का वो स्मारक, जिसे देखकर ताजमहल बनवाने वाले शाहजहां भी रह गए थे हैरान, पढ़ें भारत में बने ईरानी स्मारक की पूरी कहानी

    By Tanu GuptaEdited By:
    Updated: Wed, 21 Sep 2022 03:23 PM (IST)

    Cheeni Ka Roja नीले रंग के टाइलों से बना यह मकबरा अपनी चमक के लिए ही मशहूर था। यह इमारत ईरान की विलुप्त हो चुकी काशीकरी कारीगरी से बनी है। नीले रंग के ग्लेज्ड टाइल्स से बना चीनी का रोजा की तरह समरकंद में कई स्मारक बने हैं।

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    Cheeni Ka Roja: आगरा में यमुना किनारे स्थित चीनी का रोजा।

    आगरा, जागरण संवाददाता। ताजमहल के अलावा आगरा में बहती यमुना के किनारे बसा दूसरा स्मारक चीनी का रोजा। मुगलिया इतिहास बयां करती तमाम स्मारकों के बीच बना ईरानी स्मारक। चीनी का रोजा एक शिष्ट और सुंस्कृत ईरानी का मकबरा है, जिसने भारत की सेवा की। यह देश में एक ईरानी स्मारक है। अपनी श्रेणी में इसकी गणना सर्वाधअि महत्वपूर्ण इमारतों में होती है। इस अनूठी कला की अन्य इमारतें पाकिस्तान में लाहौर किले की चित्र भित्ति, वजीर खां की मस्जिद और आसफ खां का मकबरा है। ब्रज में काशीकारी का यह एकमात्र नमूना है। यह मुगल दरबार, संस्कृति और कला पर ईरानी का प्रभाव का सूचक है।

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    क्या है इतिहास

    ताजमहल की सुंदरता की दुनिया दीवानी है, लेकिन आगरा में ऐसा भी अनूठा स्मारक है, जिसकी खूबसूरती देखकर शाहजहां दीवाने हो गए थे। यमुना नदी के किनारे एत्माद्दौला स्मारक से पहले स्थित अनूठी धरोहर का नाम है चीनी का रोजा, जिसे शाहजहां के वजीर शुक्रुल्लाह शीराजी अफजल खां ‘अल्लामी’ ने बनवाया था। शीराजी ने खुद ही यह मकबरा अपने लिए साल 1628 से 1639 के बीच बनवाया था, जिसकी खूबसूरती को देखकर मुगल शहंशाह शाहजहां भी हैरान रह गए थे। नीले रंग के टाइलों से बना यह मकबरा अपनी चमक के लिए ही मशहूर था। यह इमारत ईरान की विलुप्त हो चुकी काशीकरी कारीगरी से बनी है। नीले रंग के ग्लेज्ड टाइल्स से बना चीनी का रोजा की तरह समरकंद में कई स्मारक बने हैं। इतिहासकार राजकिशोर राजे के मुताबिक मुगल बादशाह जहांगीर के बाद शाहजहां के दरबार में शिराजी वित्त मंत्री का दायित्व संभाले हुए थे। 1639 में अफजल खां की मृत्यु लाहौर में हुई, लेकिन उनकी इच्छा के मुताबिक आगरा में चीनी क रोजा में दफनाया गया।

    वायसराय ने जतायी नाराजगी तब शुरू हुआ रखरखाव

    ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1803 में चीनी का रोजा का रखरखाव अंग्रेजों की प्राथमिकता में था, लेकिन उसके बाद 1835 में अंग्रेज अफसर फैनी पार्क्स ने चीनी का रोजा के रखरखाव की आलोचना की। 1899 तक यह बेहद खराब हालात में रहा। इसके अंदर किसान रहे और अपने बैलों को कब्रों के पास बांधते रहे। भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इस मकबरे की स्थिति पर नाराजगी जताइ, तब यहां संरक्षण का शुरू किया गया।

    कैसे पड़ा चीनी का रोजा नाम

    मकबरे में चीनी मिट्टी टाइल्स का इस्तेमाल किया गया इसलिये नाम पड़ा चीनी का रोजा। यह इमारत ईरान की विलुप्त हो चुकी काशीकरी कारीगरी से बनी है। इस कला से निर्मित पूरे भारत में एकमात्र यही इतारम है, जो अभी तक संरक्षित है।