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भारत का 'ऑलवेज-ऑन' लोकेशन प्रपोजल: प्राइवेसी और सहमति के अधिकार की जंग

Published: Fri, 12 Dec 2025 09:31 PM (IST)

भारत में टेलीकॉम ऑपरेटरों ने स्मार्टफोन में 'ऑलवेज-ऑन' लोकेशन सर्विस का प्रस्ताव दिया था, जिससे 65 करोड़ यूजर्स हर समय ...और पढ़ें

हाल ही में भारत में लोकेशन सर्विस को'ऑलवेज-ऑन' रखने को लेकर एक प्रपोजल जारी किया गया था। Photo- Gemini AI.

हाल ही में भारत में लोकेशन सर्विस को'ऑलवेज-ऑन' रखने को लेकर एक प्रपोजल जारी किया गया था। Photo- Gemini AI. 

टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। भारत में हाल ही में एक अनिवार्य तौर पर ऑलवेज ऑन लोकेशन सर्विस के प्रपोजल पर हुई चर्चाओं से प्राइवेसी, लागू करने और फीजिबिलिटी को लेकर काफी चिंताएं पैदा हुई हैं। ये आइडिया तब आया जब टेलीकॉम ऑपरेटर्स सुझाव दिया कि स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों को यूजर्स को लोकेशन सर्विस बंद करने से रोकना चाहिए। बता दें कि ऑपरेटर्स से जांच एजेंसियां लंबे समय से ज्यादा सटीक और तेज लोकेशन डेटा देने के लिए कह रही थीं। ये आइडिया कोई ऑर्डर नहीं था। ये सिर्फ एक प्रपोजल था। लेकिन इससे चिंताएं पैदा हुईं क्योंकि 65 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स परमानेंटली ट्रेसेबल हो सकते थे। डेटा एक्सेस और एनफोर्समेंट पर भारत के नियम अभी भी बदल रहे हैं, जो ऐसे प्रपोजल को ज्यादा सेंसिटिव बनाता है।

तो, प्रपोजल क्या है? भारत में, बाकी दुनिया की तरह, लोकेशन सर्विस इन टेक्नीक के मिक्स पर डिपेंड करती हैं। जिस बदलाव पर विचार किया जा रहा है, वह ये है कि उन्हें कैसे एक्सेस किया जा सकता है। सिर्फ ऐप या यूजर के कहने पर लोकेशन स्विच ऑन होने के बजाय, प्रपोज्ड 'ऑलवेज-ऑन' रूल सैटेलाइट-बेस्ड लोकेशन सिस्टम को हर समय एक्टिव रखता, जिससे वे सिग्नल लगातार मिलते रहते।

रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 'दुनिया में कहीं और इसका कोई उदाहरण नहीं है।' 'A-GPS टेक्नोलॉजी... आमतौर पर तभी ऑन होती है जब कुछ ऐप चल रहे हों या जब इमरजेंसी कॉल की जा रही हों।' US और यूरोप में, इमरजेंसी लोकेशन सिस्टम तभी एक्टिवेट होते हैं जब कोई डिस्ट्रेस कॉल की जाती है। ऑफिशियली, चीन भी ऐसा ही करता है।

OECD (ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट, 38 अमीर इकॉनमी का प्रभावशाली ग्रुप) द्वारा होस्ट किए गए एक ऑटोमेटेड मॉनिटर ने कहा कि इससे 'शायद प्राइवेसी और सिक्योरिटी का उल्लंघन हो सकता है, जो ह्यूमन राइट्स को नुकसान पहुंचाने का एक तरीका है। अभी तक किसी असली नुकसान की रिपोर्ट नहीं आई है, लेकिन भरोसेमंद रिस्क और इस उपाय पर सरकार का विचार इसे AI हैजर्ड के तौर पर क्लासिफाई करने को सही ठहराता है।'

TOI ने रिपोर्ट किया था कि ज्यादा सटीक और फास्ट लोकेशन डेटा के लिए बातचीत पिछले पांच सालों से चल रही है, लेकिन 'ज्यादा प्रोग्रेस नहीं हुई है'। खास तौर पर प्राइवेसी की चिंताओं के कारण और क्योंकि डिवाइस बनाने वालों को समझ नहीं आ रहा है कि वे यूजर की मंजूरी के बिना ऐसा कैसे कर सकते हैं। ये एक अड़चन रही है।

2016 में, सरकार ने स्मार्टफोन मेकर्स से कहा था कि वे ये पक्का करें कि लोकेशन ट्रैकिंग के लिए सभी डिवाइस में GPS हो- फीचर फोन में भी। हालांकि, मेकर्स ने कहा कि इससे सस्ते फीचर फोन की कीमतें बढ़ जाएंगी, जिन्हें उस समय ज्यादातर भारतीय इस्तेमाल करते थे, इस पर कुछ बहस हुई और फिर ये आइडिया छोड़ दिया गया। भारत में अभी भी 35 करोड़ फीचर फोन यूजर हैं।

हालांकि, आज की जिंदगी में पहले से ही बहुत सारा लोकेशन डेटा जनरेट होता है, लेकिन इसका मतलब सिर्फ मैपिंग से कहीं ज्यादा है। कई इंडस्ट्रीज लोकेशन सिग्नल का इस्तेमाल सही कामों के लिए करती हैं, जैसे हॉस्पिटल में इक्विपमेंट ट्रैक करना, वेयरहाउस में कंसाइनमेंट मॉनिटर करना, एयरपोर्ट पर ज़मीनी गाड़ियों को कोऑर्डिनेट करना, बैंक ट्रांजैक्शन को वैलिडेट करना और इमरजेंसी टीम का परेशान कॉल करने वालों का पता लगाना। हालांकि, सटीक GPS कोऑर्डिनेट से कहीं ज्यादा जरूरी जानकारी दिखा सकता है।

IIT-दिल्ली की एक स्टडी (अक्टूबर) में पता चला कि आसानी से मिलने वाला GPS डेटा ये पहचान सकता है कि कोई व्यक्ति बैठा है, खड़ा है, लेटा है, मेट्रो या फ्लाइट में सफर कर रहा है, या भीड़-भाड़ वाली खुली जगहों पर है। वो भी बिना कैमरा, माइक्रोफोन या मोशन सेंसर का इस्तेमाल किए।

इसके अलावा, कमर्शियल डेटा ब्रोकर, ऐप एडवरटाइजिंग SDK और लीक से चलने वाले रीसेलर नेटवर्क लंबे समय से रियल-टाइम या लगभग रियल-टाइम मोबाइल लोकेशन डेटा का लेन-देन करते आ रहे हैं, जिसे अक्सर पैसे देकर खरीदा जा सकता है।

जब यूज़र लोकेशन सर्विस बंद कर देते हैं, तब भी फोन सेल टावर, वाई-फाई नेटवर्क और ब्लूटूथ बीकन का पता लगाते रहते हैं। क्योंकि, ये रेडियो कनेक्टिविटी के लिए एक्टिव रहते हैं। हालांकि, डिवाइस बिना किसी खास ट्रिगर के सटीक कोऑर्डिनेट कैलकुलेट नहीं कर सकता, लेकिन लोकेशन डिसेबल करने से ट्रेसेबिलिटी काफी कम हो जाती है।

ये अंतर यूजर की परेशानी की जड़ में है: लगातार लॉग किसी व्यक्ति की जिंदगी को असरदार तरीके से मैप करते हैं। इसका गलत इस्तेमाल पहले भी हुआ है; उदाहरण के लिए, एक कैथोलिक पादरी के सेक्सुअल ओरिएंटेशन का पता तब चला जब एक पब्लिकेशन ने उसे गे बार में जाने से जोड़ने वाले कमर्शियल लोकेशन डेटासेट खरीदे। असली मुद्दा ऑप्ट आउट करने का अधिकार बना हुआ है। चाहे वह जॉब इंटरव्यू, पर्सनल मेडिकल विजिट या निजी रिश्तों से जुड़ा हो, अपनी लोकेशन छिपाने की क्षमता व्यक्तिगत आजादी के लिए जरूरी है- और ये प्रपोजल उस सीमा को चुनौती देता है।

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