Ramcharitmanas: जगत के सभी रोगों की अचूक औषधि है तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस
संसार रूपी इस अनंत आकाश में मनुष्य की सूक्ष्मतम वृत्तियां उन तारों की तरह हैं जो चंद्रमा को पसंद नहीं करती हैं। चंद्रमा के रहते वे अपने आप को पूरी तरह दिखा नहीं पाते हैं। उनको अमावस्या पसंद है ताकि सारा संसार यही समझे कि प्रकाश का मूल केंद्र वे तारे ही हैं। सारा विश्व इन्हीं से आलोकित हो रहा है।
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। संत जब रोगों का वर्णन करते हैं तो रोग प्रत्यक्ष होता है और कृपा की औषधि परोक्ष होती है। यदि हम सात्विक श्रद्धा को लेकर सद्गुरु के पास जाएं तो वे हमें भवपाश से मुक्त कर देते हैं।
मानस रोगों का अंत करते हुए काकभुशुण्डि जी ने मात्सर्य और अविवेक दो प्रकार के ज्वर बताए हैं। दूसरे को आगे बढ़ते देखकर उससे आगे निकलने की इच्छा मात्सर्य है। इसके मूल में अविवेक होता है। बुखार में व्यक्ति के शरीर का ताप बढ़ जाता है। तेज ताप में कभी-कभी माथे पर ठंडी पट्टी भी रखनी पड़ती है।
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पढ़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि।।
अंत में तुलसीदास जी ने लिख दिया कि… :
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।
सत्संग से विवेक पुष्ट होता है और जिन असद् कारणों से हम उत्तेजित हो रहे थे, उनके मिथ्यात्व का बोध होने के पश्चात हमारे मन, बुद्धि, अहंकार का ताप संतुलित हो जाता है और हम चित्त की पावन निर्दोष भूमि में जाकर संसार और संसार की घटनाओं को मौसम के रूप में देखकर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाते हैं।
बिनु सत्संग बिबेक न होई।
रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।
हमारे धर्म की सनातनता का सबसे बड़ा कारण यह है कि वह अनावृत है। यहां कुछ ऐसा है ही नहीं कि किसी को अनावरण करना पड़े। इसमें जो है, वह छिपाया नहीं गया है और जो नहीं है, उसे दिखाया नहीं गया है। कपट और दंभ के अभाव में मात्सर्य भावना एवं अविवेक का प्रश्न ही नहीं उठता है।
न भरत लक्ष्मण बनना चाहते हैं, न लक्ष्मण भरत बनना चाहते हैं। जो जैसा है, राममय है। मात्सर्य और अविवेक में स्थित व्यक्ति पहले दूसरे की तरह बनना चाहता है और फिर उससे आगे दिखाने की चेष्टा में लग जाता है, इसी में उसका ताप बढ़ जाता है और वह रोगी हो जाता है।
उससे बचने के लिए बहुत प्रकार के नियम धर्माचरण, तप, यज्ञ, दान जैसी अनेक प्रकार की औषधियां व्यक्ति करता है, पर उसके करने का अहंकार हो जाने से उसका लाभ न होकर उल्टे हानि हो जाती है। अंततोगत्वा सत्संग और भगवत्कृपा ही एक ठोस आधार है, जिससे मनुष्य मानस रोगों से मुक्ति पा सकता है।
संसार रूपी इस अनंत आकाश में मनुष्य की सूक्ष्मतम वृत्तियां उन तारों की तरह हैं, जो चंद्रमा को पसंद नहीं करती हैं। चंद्रमा के रहते वे अपने आप को पूरी तरह दिखा नहीं पाते हैं। उनको अमावस्या पसंद है, ताकि सारा संसार यही समझे कि प्रकाश का मूल केंद्र वे तारे ही हैं। सारा विश्व इन्हीं से आलोकित हो रहा है।
आप न होते तो रात काली हो जाती। यह जानते हुए कि चंद्रमा कल से ही दस्तक देने वाला है, तब भी तारों को यही कहकर प्रसन्न रखिए, ताकि ये आपके ऊपर ग्रहण न बन जाएं। मानस रोगों को किसी में मत देखो, किसी में भी पहचानो मत, किसी को बताओ मत, क्योंकि मानसिक रोगी जानने से खीज जाता है।
जाने ते खीजहिं कछु पापी।
नास न पावहिं जन परितापी।।
भगवान को हृदयाकाश मे धारण करके साधक को सभी के गुणों को स्वीकार करना चाहिए। ज्ञान और भक्ति दो मार्ग हैं। परम शांति की प्राप्ति के लिए या तो ज्ञान का दीपक जलाइए, नहीं तो भक्ति की मणि को पहचानिए। यदि साधन और समय है तो ज्ञान का दीपक जलाने की लंबी श्रृंखला को साधना के द्वारा संपादित करिए, नहीं तो दासोऽहं के द्वारा भगवान की कृपा को स्वयं में देखकर भक्ति मणि के प्रकाश में उनकी प्रसादित कृपा को देखिए कि भगवान ने हमें यह शरीर देकर कितनी महान कृपा की है कि हम चल पा रहे हैं, भोजन मिल रहा है, हम उसका भोग कर पा रहे हैं।
मस्तिष्क चल रहा है। आंखें देख पा रही हैं। इनमें से किसी का अभाव हो जाने पर हम व्याकुल होकर अस्पताल पहुंच जाते हैं। सत्संग में प्राप्त कृपा का दर्शन कराकर साधक को भगवान के सम्मुख किया जाता है। जीवन विध्वंस करने के लिए नहीं है। किसी की सीमा में प्रवेश मत करिए। अपनी सीमा में रहिए, दूसरे को अपनी सीमा समझ आ जाएगी।
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जब कमी दूसरे में लगे और अपने में गुण दिखाई दें तो समझो हमें मानस रोग हो गया। जब ऐसा लगे कि जैसा कार्य या प्रगति हमने की, वैसी किसी ने नहीं कि तो निश्चित समझ लीजिए हम रोगी हो गए हैं। हर व्यक्ति में गुण हैं, उन गुणों का सदुपयोग हम तभी कर पाएंगे, जब हम उसे स्वीकार कर लेंगे।
हनुमान जी को भरत में गुण दिखाई देते हैं, लक्ष्मण में भरत को गुण दिखाई देते हैं। भरत को लक्ष्मण में और राम जी सीता जी को सबमें गुण दिखाई देते हैं, इसीलिए राज्य के बंटवारे को लेकर अयोध्या में कोई समस्या ही नहीं आई। यदि मंथरा के बरगलाने पर महारानी कैकेयी में अहमता ममता का मानस रोग आया तो उन्हीं के पुत्र भरत जो रामायण के सद्गुरु हैं, जिनके वचनों पर, जिनके कर्म और चरित्र पर श्रीराम को इतना भरोसा है कि वे चित्रकूट में लक्ष्मण से कहते हैं :
लखन तुम्हार सपथ पितु आना।
सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।
भरतहिं होइ न राज मदु बिधि हरि हर पद पाइ।
कबहुं कि कांजी सीकरनि छीर सिंधि बिनसाइ।।
लक्ष्मण, मैं तुम्हारे और पिता जी की शपथ लेकर कह रहा हूं कि भरत जैसा पवित्र और अच्छा भाई संसार में कोई नहीं! लक्ष्मण भी उनके भाई हैं, पर भगवान जानते हैं कि जो मेरे साथ मुझको अर्पित हो चुका है, उसके अंत:करण में मात्सर्य और अविवेक का ज्वर नहीं हो सकता। भगवान राम के प्रति प्रेमाधिक्य के कारण जो संदेह की छाया आ गई थी और श्रीभरत से युद्ध करने को तैयार थे, वे अपनी त्रुटि स्वीकार करके संकोच में पड़ जाते हैं तथा भगवान राम और मातुश्री सीता ने लक्ष्मण के सिर पर हाथ फेरते हुए प्रेम से अपने बीच में बैठा लिया।
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तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस संसार के भव रोगों की वह औषधि है, जिसका पान करके हम सब संसार सागर को पार कर मन-वचन-कर्म से शुद्ध रहकर भगवान के श्रीपाद्पद्मों में स्थान प्राप्त कर सकते हैं।
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