पितृपक्ष 2026: सामर्थ्य न होने पर कैसे करें पिंडदान? पितरों की तृप्ति के लिए शास्त्रों में बताए गए ये उपाय
यदि कोई व्यक्ति पितरों का विधि-विधानपूर्वक श्राद्ध करने में समर्थ नहीं है, उसके लिए भी शास्त्रों में व्यवस्था दी गई है...

श्रद्धा ही है श्राद्ध का मूल
प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री, पूर्व अध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी। श्रद्धापूर्वक शास्त्र विधि से पितरों की तृप्ति के लिए किया गया तर्पण आदि कृत्य श्राद्ध हैं। पितरों को निमित्त बना करके उनके प्रति श्रद्धाभाव से किया गया स्मरण, समर्पण, अथवा पदार्थरूप में पिंडदान आदि को श्राद्ध कहा जाता है।
इस काल विशेष में पितरों के निमित्त गया, पुष्करक्षेत्र, हरिद्वार कनखल, बद्रीनाथ, तीर्थराज प्रयाग अथवा काशी में श्राद्ध करने का शास्त्रों में विधान है। जो इन स्थलों पर भी जाने में असमर्थ हैं, वे कही भी नदी या तालाब में अथवा कूपोदक जल से भी श्राद्ध अवश्य करें।
अन्नदान की क्षमता न हो तो क्या करें?
धनाभाव या उपयुक्त सामग्री के अभाव में भोजन आदि कराने की स्थिति में न रहने पर अन्नदान यथाशक्ति कर दें। यदि अन्नदान करने में सामर्थ्य न हों तो अपनी शक्ति के अनुसार कच्चाधान (सीधा) किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दें। यदि इसकी भी सामर्थ्य न हो तो थोड़ा-सा तिल अर्पित करें। और यदि इतना भी संभव न हो तो सात या आठ तिल जल में मिलाकर श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त जलांजलि दें।
गाय के लिए एक दिन का चारा श्रद्धापूर्वक देना भी श्राद्ध का विकल्प बताया गया है। निर्धनता की स्थिति में वराह पुराण तथा विष्णु पुराण व्यवस्था देते हुए कहा गया है कि भोज कराने पर असमर्थता में केवल असिद्ध अन्न (आटा आदि) जंगली शाक-पात अथवा यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करें अथवा घास छीलकर किसी एक गाय को खिला दें। यदि इसमें से कुछ भी संभव न हो सके, तब किसी वृक्ष के पास जाकर दोनों हाथ ऊपर उठाकर दिग्पालों एवं पितरों से प्रार्थना करें, मेरे पास न तो धन है न ही अन्य वास्तु जिससे पितरों का श्राद्ध कर सकूं, अतः मैं श्रद्धापूर्वक पितरों को प्रणाम करता हूं। पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों, मैंने ये हाथ आकाश अर्थात वायु के मार्ग में फैला दिए है।
स्कंद पुराण में क्या लिखा है?
गोभिल स्मृति का कहना है कि थोड़ी सामर्थ्य होने पर किसी एक विद्वान को आमंत्रित करके उसे भोजन कराके पार्वण श्राद्ध का संपादन करना चाहिए और कम सामर्थ्य रहने पर कुश निर्मित वटु की आकृति पर नैवेद्य अर्पित करके पार्वण श्राद्ध संपन्न करने चाहिए। स्कंद पुराण की उक्ति है प्रवास में, यात्रा में, आपत्ति काल में, द्रव्याभाव में, रुग्णावस्था में, संतान जन्म में, पत्नी के रजस्वलावस्था में, यथाप्राप्त वस्तु से श्रद्धापूर्वक पार्वण श्राद्ध संपन्न करना चाहिए, लेकिन संपन्नता होने पर वित्त शाठ्यता करने पर पितर शाप देते हैं। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में वर्णन आता है कि दंडकारण्य में निवास करते हुए राम ने इंगुदी बैर तथा बेल से पितरों का श्राद्ध किया था। वहां कहा गया है कि देव पितरों को वही अर्पित करना चाहिए जो व्यक्ति स्वयं खाता है
इङ्गुदैर्बदरैर्बिल्वैः रामस्तर्पयते पितॄन्।
यदन्नः पुरुषो भुंक्ते तदन्नास्तस्य देवताः॥
अतः धर्मज्ञों का कहना है कि तस्मात् स्वशक्त्या विधिवत शाकमात्रेणापि श्राद्धं कुर्यात्। अतएव अपनी शक्ति के अनुसार विधिवत शाकपात मात्र से ही श्राद्ध करना चाहिए।
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