संगीत सुनना भी बन सकता है मोह का कारण? भगवान दत्तात्रेय की हिरण वाली कथा से समझिए
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया ...और पढ़ें
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भगवान दत्तात्रेय की हिरण कथा: संगीत कैसे बन सकता है मोह और बंधन का कारण
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम, ऋषिकेश)। भगवान दत्तात्रेय महाभाग महाराज यदु को उपदेशित करते हैं-
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित्।
शिक्षेत हिरणद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात्।।
हे राजन्! वन में विचरण करने वाले यति को कभी ग्राम्यगीत नहीं सुनना चाहिए। उसे उस हिरण से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, जो शिकारी के मधुर संगीत से मोहित होकर उसके बंधन में जा फंसता है।
यहां ‘ग्राम्यगीत’ मात्र गीत-विशेष का संकेत नहीं, अपितु उन समस्त श्रव्य विषयों का प्रतीक है, जो चित्त में काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग और विषयासक्ति को उद्दीप्त करते हैं। साधक के लिए श्रवण केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि चित्त के निर्माण का अत्यंत सूक्ष्म द्वार है। कानों द्वारा जो भीतर प्रवेश करता है, वही धीरे-धीरे मन की वृत्तियों का स्वरूप निर्धारित करने लगता है।
एक बहेलिया हिरण को पकड़ने के लिए छिपकर मधुर संगीत बजाता है। मोहिनी तान सुनकर हिरण अपने स्वाभाविक भय और सावधानी को विस्मृत कर देता है। वह उसके आकर्षण में शिकारी के समीप पहुंच जाता है और उसे अपनी आसन्न मृत्यु का भी भान नहीं रहता। इस अवसर का लाभ उठाकर दूसरा शिकारी उस पर बाण चला देता है। बाण हिरण की मृत्यु का कारण नहीं, वह पहले ही श्रवण के मोह में अपनी विवेक-दृष्टि खो चुका था। हे राजन्! जिस प्रकार हिरण कर्णेंद्रिय के विषय—मधुर स्वर के प्रति आसक्त होकर अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है, उसी प्रकार विषयानुरागी जीव भी इंद्रियों के आकर्षण में पड़कर अपने परम पुरुषार्थ को विस्मृत कर देता है। संसार के आकर्षण आरंभ में अत्यंत मधुर प्रतीत होते हैं, किंतु उनके पीछे छिपा हुआ बंधन दृष्टिगोचर नहीं होता।
विषय पहले मन को मोहित करते हैं, फिर विवेक को हर लेते हैं और अंततः जीव को बंधन में डाल देते हैं। इसलिए साधक के लिए इंद्रिय-संयम साधना का कोई गौण अंग नहीं, बल्कि उसकी रक्षा-कवच है। विशेषतः श्रवणेंद्रिय अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली है। आंखों को बंद कर लेना सरल हो सकता है, किंतु कानों को संसार की ध्वनियों से सर्वथा पृथक् कर पाना कठिन है। इसलिए साधक को यह विवेक रखना चाहिए कि वह क्या सुन रहा है, किससे सुन रहा है और सुनने के पश्चात् उसके चित्त में कैसी वृत्ति उत्पन्न हो रही है।
कामुकता, विषय-विलास और सांसारिक राग-रंग से परिपूर्ण गीत, वार्तालाप अथवा चर्चाएं चित्त को चंचल बनाकर साधक के भीतर सुप्त वासनाओं को जगा सकती हैं। जो मन जप में लगना चाहिए, वह कल्पनाओं में भटकने लगता है; जो बुद्धि आत्मचिंतन में प्रवृत्त होनी चाहिए, वह विषय-चिंतन में उलझ जाती है और जो हृदय भगवद्भक्ति में द्रवित होना चाहिए, वह क्षणिक आकर्षणों में आसक्त होने लगता है। इसीलिए कानों से वही सुना जाए जो अंत:करण को ऊपर उठाए—भगवन्नाम, भगवद्गुण, भगवद्भक्ति, गुरु-वचन, शास्त्र-चर्चा, ज्ञान-वैराग्य का उपदेश और संतों का सत्संग।
भगवान् दत्तात्रेय का आशय है कि संसार के मध्य रहते हुए मनुष्य बाह्य विषयों का त्याग कर दे। वास्तविक वैराग्य तो तब है, जब विषय सामने उपस्थित हों और फिर भी मन उनकी ओर आकृष्ट न हो। विषय से दूर रहना प्रारंभिक साधना है, विषय के आकर्षण से मन को बचा लेना परिपक्व वैराग्य है। हिरण हमें यही सिखाता है कि साधक को अपनी दुर्बलताओं को पहचानना चाहिए। जिस इंद्रिय के माध्यम से पतन संभव है, उसी को साधना का माध्यम भी बनाया जा सकता है। यदि श्रवण विषयों का द्वार बन सकता है, तो वही श्रवण हरिनाम और हरिकथा का द्वार भी बन सकता है। हे राजन्! इसलिए एक आध्यात्मिक साधक को अपने कानों से ऐसा कुछ भी नहीं सुनना चाहिए, जिससे उसका मन संसार में बंधे। एक ओर श्रवण भवबंधन का कारण बन सकता है, तो दूसरी ओर वही श्रवण भगवत्प्राप्ति का महामार्ग भी बन सकता है।
