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जब सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो क्या साथ जाएगा? श्राद्ध से समझें जीवन की ये सीख

Published: Mon, 28 Sep 2026 12:45 PM (IST)

श्राद्ध में हम अपने पूर्वजों के गुणों व संस्कारों के प्रति श्रद्धावनत होते हैं अर्थात आत्मा के गुण ही हैं, ...और पढ़ें

श्राद्ध पर्व की आध्यात्मिक सीख: मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या जाता है?

श्राद्ध पर्व की आध्यात्मिक सीख: मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या जाता है?

ब्रह्मा कुमारी शिवानी, वक्ता। श्राद्ध के दिन चल रहे हैं। परिवार में जिन आत्माओं ने शरीर छोड़ा है, उन्हें स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का समय है। जरूर आप यह सोचते होंगे कि हमारे वे परिजन कहां होंगे? शायद उन्होंने कोई नया शरीर धारण कर लिया होगा या शायद वह पितृलोक में होंगे। श्राद्ध के दिनों में हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमारे पितृ हमारे लिए सबकुछ छोड़कर गए, अपने संस्कार और संपत्ति, सब कुछ हमें दे गए, अपने साथ कुछ नहीं ले गए। हमें भी इस संसार से एक दिन विदा होना है और हम भी कोई भौतिक वस्तु लेकर नहीं जाएंगे। हां, हम अपने संस्कार देकर भी जाएंगे और वही लेकर भी जाएंगे। इसलिए हम क्या-क्या अपने परिवार और समाज को दे सकते हैं, यह हमें सोचना होगा।

वास्तव में हमारी संस्कृति में जो धार्मिक परंपराएं हैं, वे हमारे जीवन में अच्छी शिक्षा व संस्कार धारण करने के लिए होती हैं। पितृपक्ष या श्राद्ध के साथ भी ऐसा ही है। हम अक्सर एक बात का तो ध्यान रखते हैं कि जब हम जाएंगे तो अपने पीछे क्या छोड़ कर जाएंगे। पीछे वालों के लिए हम संपत्ति बनाते हैं, पर हम यह ध्यान नहीं रखते हैं कि हम साथ में क्या लेकर जा रहे हैं?

आध्यात्मिकता का यह भी मतलब है कि आत्मा अंत में क्या साथ लेकर जाएगा? जब हम कभी दाह संस्कार करने श्मशान में जाते हैं तो हम लोगों में घना वैराग्य आ जाता है और कहते हैं कि वह अमीर आदमी था, लेकिन सब कुछ तो यहीं रह गया? यह श्मशानी वैराग्य थोड़ी देर के लिए आता है कि खाली हाथ आए थे और गए भी खाली हाथ। लेकिन यह सच नहीं है कि हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे। असल में जो भी कुछ दिखता है, जो भौतिक है, उसे हम न तो साथ लेकर आए थे, ना ही लेकर जाएंगे। तो अब विचार करें कि जब हम शरीर छोड़ेंगे तो क्या क्या पीछे छोड़ेंगे? धन-संपत्ति, सगे-संबंधी, शरीर सब कुछ। तो फिर साथ क्या जाएगा? केवल अंतरात्मा, उसके संस्कार और सारे कर्म (जो हमने जीवन भर किए हैं) वही साथ जाएंगे।

कभी सोचा है कि जब दो बच्चे एक ही घर में, एक ही माता-पिता से, एक ही समय और एक ही प्रकार के ग्रह-नक्षत्र में जन्म लेते हैं, फिर भी उनके भाग्य अलग-अलग क्यों होते हैं? किस आधार पर उनका भाग्य अलग-अलग हुए? वास्तव में उन दोनों की आत्माएं पिछले जन्म से जो भी संस्कार लेकर आई हैं, वे अलग-अलग है। क्योंकि देखा जाता है कि बचपन से ही कोई बच्चा बहुत शांत है, तो कोई अधिक चंचल होता है। कोई खुशमिजाज है, तो कोई रोते रहने वाला। कोई अपनी चीजें दूसरों के साथ बांटकर खुश होता है, तो कोई दूसरों को देने से कतराता है। हम स्वयं से पूछें कि मैं किस तरह की बच्चा बनना चाहता हूं?

खुश रहने वाला, सदा मुस्कुराने वाला या छोटी-छोटी बातों में रूठने वाला? दूसरों को देने में खुश होने वाला या औरों की सफलता से ईर्ष्या करने वाला? कैसे संस्कार वाला बच्चा बनना है मुझे? देखा जाए तो जो पीछे रह जाएगा, उसके लिए तो हम इतना मेहनत करते हैं, पर जो साथ में जाएगा, उसे धारण करने में हम कम ध्यान देते हैं। श्राद्ध में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के साथ हमें यह भी याद रहे कि हमें भी एक दिन ऐसे जाना है? इसलिए हमें इस पर चिंतन करना चाहिए कि हम क्या लेकर जाएंगे। हमें प्रयास करना चाहिए कि हम अच्छे संस्कार साथ लेकर जाएं। इसीलिए शरीर छोड़ने से पहले कहा जाता है कि भगवान को याद करो, सबको क्षमा करो और सभी को धन्यवाद दो।

मृत्यु जीवन के लिए एक सीख है कि जीवन में कोई भी गांठ नहीं होनी चाहिए। सबके बीच में रहकर भी एकदम संयत और सरल रहना है। कुछ लोग पहले से ही अपने परिवार वालों से कह देते हैं कि मेरे जाने के बाद फलाने व्यक्ति से बिल्कुल बात नहीं करनी है। यह दुश्मनी का भाव मरने वाले व्यक्ति में रह जाता है, जो यह कहता है कि मेरे जाने के बाद भी झगड़ा चालू रखें। जो आत्मा ऐसा सोच लेकर जाएगा तो क्या वह आत्मा कभी शांत रह पाएगा? ऐसा आत्मा कितनी अशांति लेकर जाता है?
यह सब इसलिए होता है कि हम अपनी जीवन की प्राथमिकता के बारे में स्पष्ट नहीं होते हैं। छोटी-छोटी बातों में अहंकार पाल लेते हैं। इसलिए हमें व्यर्थ के इन संस्कारों को छोड़ने की प्रेरणा श्राद्ध से लेनी चाहिए। क्योंकि जब तक हम नकारात्मक चीजों को नहीं छोड़ेंगे, तब तक हमारे जीवन में सुख शांति नहीं आ सकती है। जहां मन में 'मैं पन' है, चित में अहंकार है, वहां दिव्यता नहीं आ सकती है।

श्राद्ध कर्म की मूल शिक्षा है कि हम अपनी संस्कारों को आध्यात्मिक बनाएं, साथ ही सारी सांसारिक आसक्तियों से मुक्त हो जाएं। हमारे भीतर कोई गांठ या आसक्ति ना रहें, ताकि जब भी शरीर त्यागने की क्षण आ जाए शांति से जाएं। रिश्तों में कोई भी लेन-देन रह नहीं जाए। लेन-देन सिर्फ स्थूल धन का नहीं, अपितु हमारे आत्मा का दूसरे आत्माओं के साथ सारे हिसाब-किताब भी अभी चुकता हो जाना चाहिए। इन्हें सेटल करने के बाद ही सही रूप से देवी आवाहन हो सकता है। इसलिए हमें ईश्वरीय कृपा और परमात्म योग से अपने मन, बुद्धि और संस्कारों की मलिनता को मिटाना है। क्योंकि श्राद्ध में हम अपने पूर्वजों के गुणों और सुसंस्कारों को याद करके उनके प्रति श्रद्धावनत होते हैं।

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