16 दिन नहीं कर सकते श्राद्ध? शास्त्रों में बताए हैं इन दिनों के भी खास विधान
मान्यता है कि पितृपक्ष में सभी पितर पितृलोक को छोड़कर पृथ्वी पर आ जाते हैं। यह पितरों के प्रति श्रद्धा ...और पढ़ें
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पितृपक्ष में श्राद्ध के नियम: जानें कब और कैसे करें पूर्वजों का तर्पण
प्रो. मुरली मनोहर पाठक (कुलपति, श्रीलालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय)। भारत की सनातन परंपरा देवताओं, ऋषियों और पितरों की पूजा का विधान करती है। वर्ष में इन सबके पूजन के लिए अलग-अलग समय निर्धारित किए गए हैं। मान्यता है कि पितरों के आर्शीवाद से ही लौकिक समृद्धि एवं वंश परंपरा की निरंतरता बनी रहती है। यद्यपि प्रत्येक माह का कृष्ण पक्ष पितरों के लिए निर्धारित है, तथापि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष के रूप में जाना जाता है। पृथिवीचन्दोदय नामक ग्रन्थ में कहा गया है-
आषाढीमवधिं कृत्वा पञ्चमपक्षमाश्रिताः।
कांक्षंति पितरः क्लिष्टाः अन्नमप्यन्वहं जलम्।।
तात्पर्य यह है कि आषाढ मास की पूर्णिमा से पांचवें पक्ष में अर्थात आश्विन कृष्णपक्ष में पितर प्रतिदिन अन्न और जल की आकांक्षा करते हैं। कुछ आचार्य पितृपक्ष 15 दिनों का और कुछ 16 दिनों का मानते हैं। इसमें कुछ ने भाद्रपद की पूर्णिमा तथा कुछ ने आश्विन शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को जोड़कर पितृपक्ष के 16 दिन निर्धारित किए हैं। इस अवधि में प्रतिदिन श्राद्ध करने का विधान है। जो नहीं कर सकें, उन्हें पंचमी से लेकर आमावास्या तक श्राद्ध करना चाहिए। जो यह भी न कर सकें, उन्हें अष्टमी से आमावास्या तक तथा जो यह भी न कर सकें उन्हें दशमी से लेकर आमावास्या तक पार्वण श्राद्ध करना चाहिए। यदि यह भी न हो सके तो केवल आमावास्या को भी श्राद्ध किया जा सकता है।
कृत्यसारसमुच्चय में कहा गया है-
यो वै श्राद्धं नरः कुर्यात् एकस्मिन्नपि वासरे।
तस्य संवत्सरं यावत् सन्तृप्ताः पितरो ध्रुवम्।।
अर्थात पितृपक्ष में जो व्यक्ति एक दिन भी श्राद्ध करता है, उसके पितर वर्ष भर निश्चित रूप से संतुष्ट रहते है। श्राद्धमयूख नामक ग्रंथ में कहा गया है कि जो व्यक्ति आश्विन मास में श्राद्ध नहीं करता है, वह पाप का भागी हेाता है। एक दिन श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को अपने पिता के मृत होने की तिथि को श्राद्ध करना चाहिए यथा-
या तिथिर्यस्य तातस्य मृताहे तु प्रवर्त्तते ।
सा तिथिः पितृपक्षेsपि पूजनीया प्रयत्नतः।।
श्राद्ध के अधिकारियों का निर्धारण करते हुए श्राद्धमयूख में कहा गया है -
पितुः पुत्रेण कर्त्तव्या पिण्डानोदकक्रिया ।
पुत्राभावे तु पत्नी स्यात्पत्न्यभावे तु सोदरः ।।
पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रे वा भ्राता वा भ्रातृसन्ततिः।
सपिण्डसन्ततिर्वापि श्राद्धार्हा नृप जायते ।।
तात्पर्य यह है कि पिता की पिण्डदानादि क्रियाएं पुत्र के द्वारा की जानी चाहिए। पुत्र के अभाव में पत्नी, पत्नी के अभाव में भाई भी कर सकता है । इस प्रकार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाई की संतान अथवा सपिंड की संतान भी श्राद्ध करने के अधिकारी हैं। पार्वण श्राद्ध का काल निर्धारित करते हुए इसे अपराह्ण में संपन्न करने का विधान है- अपराहणे तु पार्वणम् (याज्ञवल्क्य स्मृति)। सामान्यतः संध्याकाल एवं रात्रि में श्राद्ध करने का निषेध है, किंतु यदि राहु का दर्शन हो जाए तो उस समय भी श्राद्ध किया जा सकता है।
यथा सन्ध्यारात्र्योर्न कर्त्तव्यं श्राद्धं खलु विचक्षणैः।
तयोरपि च कर्त्तव्यं यदि स्याद्राहुदर्शनम्।। (श्राद्धमयूख)
तर्पण करते समय देवताओं को सफेद चावल के साथ, ऋषियों को यव के साथ तथा पितरों को तिल के साथ तर्पण करना चाहिए। भारत की यह विशेषता है कि तर्पण करने वाला व्यक्ति अपने कुल के ज्ञात-अज्ञात सभी पूर्वजों का तर्पण करने के बाद अंत में बाल ब्रहमचारी भीष्म पितामाह को भी तर्पण करना है। देवताओं का तर्पण पूर्वाभिमुख होकर, ऋषियों का तर्पण उत्तराभिमुख होकर और पितरों का तर्पण दक्षिणाभिमुख होकर किया जाता है।
पृथिवीचंद्रोदय नामक ग्रंथ में बताया गया है कि संन्यासियों, वानप्रस्थों तथा वैष्णवों का श्राद्ध द्वादशी को करना चाहिए-
यतीनां च वनस्थानां वैष्णवानां विशेषतः ।
द्वादश्यां विहितं श्राद्धं कृष्णपक्षे विशेषतः ।।
याज्ञवलक्य स्मृति के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु शस्त्रादि के घात से हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए। माता के लिए विशेष रूप से मातृ नवमी को श्राद्ध करने का विधान है। पार्वण श्राद्ध के दिन मुख्य रूप से पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही एवं मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही तथा वृद्धमातामही- इन 12 लोगों को पिंडदान करते हुए अन्य सबको पिंडदान करने का विधान है।
पितृपक्ष को महालय के नाम से भी जाना जाता हैं। इसमें मान्यता है कि सभी पितर पितृलोक को छोड़कर पृथ्वी पर आ जाते हैं। यह पितरों की परिचर्या करने का अत्यंत प्रशस्त अवसर होता हैं। तर्पण एवं श्राद्ध से तृप्त पितर धन-धान्य, पुत्र-पौत्रदि का आशीर्वाद देकर पुनः अपने लोक में चले जाते हैं। यह व्यवस्था भारत के अतिरिक्त कहीं भी नहीं है, इसलिए भारत को धर्मप्राण देश कहा जाता है।
