पर्युषण महापर्व क्यों है खास? 10 गुणों की आराधना से आत्मशुद्धि का दिखता है मार्ग
पर्युषण-दशलक्षण महापर्व एक प्रकार से भक्त से भगवान बनने की यात्रा है। स्वयं के विकारों को मिटाकर गुणों को धारण ...और पढ़ें
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पर्युषण महापर्व आत्मशुद्धि का मार्ग दस गुणों की आराधना से
डॉ. इन्दु जैन (विशेषज्ञ सलाहकार सदस्य, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली)। पर्युषण महापर्व या दशलक्षण महापर्व जैनदर्शन का एक ऐसा सौभाग्यशाली पर्व है, जिसके दोनों सिरों पर क्षमा उपस्थित है। एक उत्तम क्षमा के रूप में दूसरी क्षमावाणी (क्षमा याचना) के रूप में। पर्युषण महापर्व हमारे जीवन में आत्मजागरण का मार्ग दिखाता है। यह पर्व वर्ष में तीन बार चैत्र, भाद्रपद एवं माघ महीने में आता है। इन सभी में पूजा-आराधना होती है, किंतु भाद्रपद महीने में होने वाले दशलक्षण महापर्व का विशेष महत्व है।
पर्युषण महापर्व में 18 दिनों की विशेष धर्म-आराधना की जाती है, जिसमें श्वेतांबर परंपरा में आठ दिवसीय एवं दिगंबर परंपरा में दस दिवसीय दशलक्षण महापर्व की आराधना होती है। पर्युषण महापर्व के प्रारंभ में आठ दिन संयम-तप, स्तुति, प्रतिक्रमण आदि से आराधना की जाती है। दशलक्षण महापर्व पर उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य के दस लक्षणों अथवा गुणों की आराधना की जाती है। दशलक्षण प्राणीमात्र के पवित्र गुणों से संबंधित हैं। इन दिनों धर्म के दस लक्षणों पर विशेष श्रद्धा व भक्तिपूर्वक आराधना होती है।
दसलक्षण महापर्व के प्रथम चार दिवस धर्म के चार लक्षणों की आराधना से मन के विकारों को दूर किया जाता है। उत्तम क्षमा से क्रोध पर, उत्तम मार्दव से मान पर, उत्तम आर्जव से माया पर तथा उत्तम शौच से लोभ पर विजय प्राप्त की जाती है। उत्तम शौच मन की शुद्धता को महत्व देता है। जब आत्मा से क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कषायों (विकारों) का त्याग कर दिया जाता है और आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच गुणों को धारण किया जाता है।
चार कषायों का क्षय करके मन की शुद्धता के पश्चात उत्तम सत्य स्वत: ही प्रकट होता है, तब उत्तम संयम कहता है कि भक्त से भगवान बनने की यात्रा का शुभारंभ करो।
व्यवहार में अणुव्रत (गृहस्थों का संकल्प), महाव्रत (मुनियों का संकल्प) आदि धारण करने को ही उत्तम संयम कहते हैं। फिर उत्तम तप से संचित कर्मों की निर्जरा (क्षय) होती है। इसके पश्चात उत्तम त्याग से निज शुद्धात्म को ग्रहण करके बाह्य-आभ्यांतर परिग्रह की निवृत्ति की जाती है। 'न किंचन: इति आकिंचन:' अर्थात आत्मा के अलावा कुछ भी अपना नहीं है, इसी भाव एवं साधना से उत्तम आकिंचन्य (मेरा कुछ भी नहीं है) की आराधना की जाती है। ब्रह्मचर्य व्रत प्रारंभिक द्वार है और ब्रह्मचर्य व्रत ही पूर्णता का अंतिम द्वार है, इसलिए आचार्य कहते हैं कि ‘आत्मा में ही रमण करते रहना ही उत्तम ब्रह्मचर्य है।”
पर्युषण-दसलक्षण महापर्व पूर्ण होने के बाद क्षमा रूपी गुण को धारण करते हुए "क्षमावाणी महापर्व" मनाया जाता है। सबको क्षमा-सबसे क्षमा की भावना से अपनी आत्मा एवं समस्त सृष्टि से क्षमा याचना करते हुए, हृदय से "उत्तम क्षमा" "मिच्छामि दुक्कडं" या "मिच्छा मे दुक्कडं" (अर्थात हमारा दुष्कृत्य भी मिथ्या हो) ऐसी शब्दावली का प्रयोग करते हुए सभी से क्षमा मांगी जाती है। क्षमावाणी एक ऐसा पर्व है, जिसमें विश्वमैत्री की भावना समाहित है। इन भावनाओं को अपने जीवन में उतारते हुए हम सभी को पर्युषण-दसलक्षण महापर्व की आराधना करनी चाहिए, ताकि हम अपने इस जीवन का कल्याण करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर रहें।
