रामचरितमानस में छिपा जीवन का बड़ा सूत्र, कब मौन रहना और कब कर्म करना जरूरी है?
तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में समय को महाशक्ति कहा है। वास्तव में, समय ही सतयुग है, वही त्रेता, द्वापर और वही कलियुग भी है।
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श्रीरामचरितमानस के अनमोल सूत्र: जीवन में कर्म और मौन का संतुलन
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष - श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। होइहि सोई जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ाबइ साखा।। राम करन चाहें सोई होई। करइ अन्यथा अस नहिं सोई।। कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।। काल धर्म गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि अचारा।।
परम पुरुषार्थ करते हुए भी काल की अखंड सत्ता को श्रीरामचरितमानस में भक्ति के रूप में ही स्वीकारा गया है। वर्तमान की हर घटना पर प्रतिक्रिया करना अविवेक है, क्योंकि भविष्य हर घटना की व्याख्या बदल देता है। मान्यताओं, आवश्यकताओं, परिभाषाओं को मनुष्य ही जन्म देता है, वही स्वयं मानता और मनवाता भी है। हम युगधर्म को नहीं बदल सकते हैं। वह शरीर की नियति की भांति नियत है। युग को दिशा देने का सद्प्रयास अवश्य कर सकते हैं, करना भी चाहिए, पर यह करते समय यह स्मरण रखना ही होगा कि व्यक्ति या समाज को हम दिशा तभी दे सकेंगे, जब दूसरे के अहंकार को सम्मान दें और अहंकारी को मिले हुए सामर्थ्य काल को स्वीकार करें। उसकी जो आवश्यकताएं हैं, उनमें उसके हित में अपनी उपयोगिता को सिद्ध कर सकें।
भारत को ज्ञान की जितनी बड़ी पूंजी मिली, संभवत: संसार में और किसी को नहीं मिली। हमारे देश का यह सौभाग्यपूर्ण पक्ष है, किंतु संकोच के साथ कहना होगा कि हमने गर्व हमेशा विदेशी दार्शनिकों पर किया। हम वेदव्यास, तुलसी, काकभुशुंडि, गर्ग के दृष्टांतों के द्वारा अपनी बात को सिद्ध करने में संकुचित होते हैं, किंतु किसी दूसरे देश के दर्शन और दार्शनिक का उदाहरण देकर गौरवान्वित अनुभव करते हैं और उसकी बिना पढ़ी हुई पुस्तकें रखकर अपनी अलमारी को समृद्ध मानते हैं। जिसे देखिए, वह प्रभावित दूसरे से है। यही हमारी हीनता और दीनता है।
रामराज्य के वर्णन में स्वच्छता, समय पालन, प्राकृतिक संपदा, वैभव, सौंदर्य, शिक्षा, उत्कर्ष सब है, पर आज का आदर्श पाश्चात्य को ही मानता है। विचित्र बात तो यह है कि पश्चिम को सूर्योदय पूर्व में ही दिखाई देता है, क्योंकि वे अपने आंतरिक मानसिक विकास और शांति के लिए गंगा की पवित्रता, हिमालय की ऊंचाई, पुराणों में गीता-रामायण के उपदेशों को ही वास्तविक मानते हैं।
असहमति, पद्धति का अंतर, दोष दर्शन या सुधार को हमारे ग्रंथों में स्वीकारा गया है, किंतु उसको प्रकट करने और स्वीकार करने की शैली को समुद्र तट पर सुंदर रूप में स्वीकारा गया, जब भगवान श्रीराम ने लंका जाने के लिए समुद्र से मार्ग के लिए विभीषण के सुझाव को समादर देते हुए साधना की और अंत में तीन दिन के पश्चात लक्ष्मण के मत को भी यथोचित मानकर बाण उठाया। विद्वान, संत, पाठक, जिज्ञासु यह मानते हैं कि कितनी गरिमामय पद्धति से कितनी विपरीतताओं और मतमतांतर के मध्य श्रीराम ने अपने संपूर्ण कार्य संपादित किए और अयोध्या में श्रीभरत की साधना पद्धति से रामराज्य की स्थापना होने के पश्चात किस तरह एक आदर्श की स्थापना की।
आज सुशिक्षित कहे जाने वाले सामर्थ्यवान लोगों के वक्तव्य सुनकर मौन हो जाने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचा। हर व्यक्ति देश चलाने की स्थिति में है। हम अपने निजी स्वार्थों के आधार पर किसी को भी जीवन देने की स्थिति में हैं। हम कुछ भी कैसे भी करने को तैयार हैं। पहले यह विचार करना उचित होगा कि हम चाहते क्या हैं? यद्यपि यह बिडंबना सार्वकालिक है। आंशिक रूप में यह समय का एक भाग है, पर व्याप्ति तो वर्तमान में है न? एक पुष्प, एक पशु, एक फल, वायु, सूर्य, चंद्र, जल, अग्नि, आकाश... ऐसा उदाहरण नहीं है, जो परंपरा से प्राप्त न हो, जिसका मूल ईश्वर न हो। अभी तक विध्वंस के जितने पदार्थ हैं, वे सब मनुष्य की कृति हैं और जीवन के उपयोगी और जीवनरक्षक पदार्थ सब ईश्वर की कृति हैं। ध्यान रहे, भक्ति केवल ईश्वर की होती है, मनुष्य को केवल उसके अहंकार की पूजा चाहिए, प्रशंसा चाहिए।
ईश्वर भक्ति के अतिरिक्त दूसरी कोई भक्ति नहीं होती। यदि ईश्वर को स्वीकार कर लिया है तो गुरु, माता, पिता, मित्र, देश, कर्म सबके प्रति भक्ति और कर्तव्यबोध स्वत: ही आ जाएगा। भगवान राम ने हनुमान जी को सत्संग से बुद्धि परिवर्तन की संभावना से रावण के पास लंका भेजा था। अब सत् का संग बहुत कम हो गया। जीवन के हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा अतिशय हो गई। अपने विवेक के द्वारा समय और काल की स्वीकृति के अतिरिक्त चिंतन के लिए कुछ बचा ही नहीं। उपाय स्वयं निकालना होगा।
युवाओं को अपने दादा-दादी तथा नानी-नानी से परिवार और बच्चों के लिए समर्पण की शिक्षा लेनी होगी। बच्चों को यह जानना होगा कि जाब से जाब का विवाह न हो, कन्या का वर से विवाह हो। शृंगार वात्सल्य को जन्म दे। वात्सल्य घर में रहकर सुशिक्षित होता है। घर को विद्यालय मानना होगा और बनाना होगा। विद्यालय की पढ़ाई में नौकरी करने का प्रमाणपत्र मिलता है। जीवन तो घर और सत्संग में मिलता है। बड़ों को बड़ा बनना होगा और अपने बड़ों के सामने छोटा बने रहना होगा। उद्यमिता को प्रतिस्पर्धा का विषय न बनाएं। प्रतिभा ईश्वर देता है, शिक्षा मनुष्य देता है। दोनों को महत्व मिलना चाहिए।
हमें वर्तमान को ऋतुओं के स्वभाव के रूप में स्वीकार करना होगा। अशांत होकर न स्वार्थ सिद्ध होता है, न ही परमार्थ। भीड़ के स्वर में स्वर न मिलाएं। भीड़ के स्वर में स्वर और व्यंजन का साम्य नहीं होता है। संज्ञा और संज्ञक का ज्ञान भीड़ को नहीं पता होता है। जैसे क के उच्चारण को अ से विभक्त नहीं किया जा सकता, उसी तरह समाज भी एक व्याकरण है, हमें हर स्वर और व्यंजन को समझकर बोलना और चलना चाहिए। आवेश एक नशा है, जो एक समय बाद उतर जाता है। जीवन और समाज की सारी व्यवस्था के लिए शिक्षा, प्रतिभा, मर्यादा, पुरुषार्थ, विश्राम, विनम्रता सबकी आवश्यकता होती है। मनुष्य को चाहिए कि वह संयत रहे। प्रदर्शन की अतिशय इच्छा हमारे अस्तित्व को हास्यास्पद बना सकती है। हमें इतिहास से सीखना है, उसे दोहराना नहीं है। देशनिष्ठ रहना ही भक्ति है।
गर्मी, सर्दी, वर्षा सबका अपना धर्म और उपयोगिता है। हम जितना कमाते हैं, वह सब न तो केवल खाने में लगाते हैं, न रहने में, न ही पहनने में, न ही शिक्षा में, हमें विवेकपूर्वक उपलब्धियों का विभाजन करना होता है। जो लोग घर में रहते हैं, उनके परिवार, संबंध, समाज, मित्रों सबके प्रति कुछ न कुछ दायित्व होते हैं। त्योहारों में विवाहादि में हम सब एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। यही विवेक है। यही मर्यादा है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापकता ही जीवन का आधार है।
कुछ भी कहें! सत्य तो यह है कि शांत, मौन, समय की स्वीकृति को माने बिना हम अपने लिए कोई समाधान नहीं दे सकेंगे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने संपूर्ण जीवन के अद्योपांत स्वरूप को श्रीराममचरितमानस में प्रस्तुत किया है। अयोध्या की शिक्षा और लंका की शिक्षा का अंतर हम हर युग में देख सकते हैं। त्रेतायुग में न तो अयोध्या में लोग अशिक्षित थे और न ही लंका में, पर परिणाम तो भिन्न हुए।
काल सुभाउ करम बरिआईं।।
भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं।।
