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श्रीकृष्ण ने सिखाया सफलता का बड़ा मंत्र! दूसरों के नहीं, अपनी क्षमता के हिसाब से चुनें लक्ष्य

Published: Mon, 14 Sep 2026 03:55 PM (IST)

युवाओं की सफलता की यात्रा का आरंभ आत्मस्वीकार से होना चाहिए। यह आत्महीनता अथवा आत्ममुग्धता पर नहीं, अपितु स्वस्थ विचारशीलता ...और पढ़ें

श्रीकृष्ण का सफलता मंत्र अपनी क्षमता पहचानें और सही लक्ष्य चुनें

श्रीकृष्ण का सफलता मंत्र अपनी क्षमता पहचानें और सही लक्ष्य चुनें

आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण (आध्यात्मिक गुरु, सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, श्रीअयोध्या जी)। भगवान श्रीकृष्ण की कथा का एक रोचक प्रसंग है उनकी मथुरा-यात्रा। कंस की प्रेरणा से अक्रूर श्रीकृष्ण-बलभद्र जी को मथुरा ले जाने आए। भगवान ग्वाल-बालकों को भी साथ लेकर मथुरा पधारे। पहली बार समृद्धिमती नगरी का दर्शन गोपबालकों को प्राप्त हो रहा था। उन्होंने अनुभव किया कि उनकी वेशभूषा नगर के अनुरूप नहीं हैं। नंदनंदन श्रीकृष्ण ने राजाधिराज के नवीन वस्त्र अपने सखाओं को दिला दिए। नए वस्त्र धारण कर उन बालकों ने अनुभव किया कि ये राजसी वस्त्र सुंदर एवं बहुमूल्य हैं, परंतु उनकी नाप के नहीं हैं।

कोई महान उपलब्धि भी अनुरूपता से ही शोभा पाती है। कथा कहती है कि वे वस्त्र श्रीकृष्ण के अनुग्रह से गोप-बालकों के अनुकूल बना दिए गए। यह एक कथा-प्रसंग है, पर इस प्रसंग से एक विचार उभरता है। उपलब्धियां, जीवन के अनेक बड़े लक्ष्य, अनेक प्राप्तियां बहुमूल्य हो सकती हैं, पर वे चाहने वाले के कितनी अनुरूप हैं, उसके अस्तित्व-व्यक्तित्व को कितना चरितार्थ बनाती हैं यह आवश्यक विचार है।

युवक-युवतियों का समाज, राष्ट्र और उसकी संस्कृति को युगानुरूप आगे बढ़ाने में नायक की भूमिका का निर्वाह करता है। उसे अपने स्वरूप की पहचान जितनी स्पष्ट होगी, उसके साधन-साध्य का विवेक भी उतना ही स्पष्ट होगा। सामान्यतया प्रत्येक कालखंड की अपनी एक तात्कालिक जीवन-दृष्टि होती है, जिसके प्रभाव में युवा पीढ़ी आगे बढ़ती है। यह दृष्टि मानव-जीवन की सार्वकालिक चिंताओं का तात्कालिक समाधान करने में सार्थक होती है। इसके केंद्र में कभी धर्म, कभी अर्थ, कभी इंद्रिय-सुख तो कभी सभ्यता के अन्य आयाम होते हैं। इस जीवन-दृष्टि के पीछे जो मानवीय-बोध आवश्यक है, वह आत्मानुशीलन अथवा आत्मसाक्षात्कार से उपजता है। अपने होने के बारे में जो कल्पित-आरोपित और आभासी प्रत्यय हैं, उनके पार अपनी वस्तुस्थिति को अधिक सजगता से समझना और स्वीकार करना सफल होने के मौलिक अनुबंधों में एक हो सकता है। चाणक्य का एक प्रसिद्ध कथन है कि किसी व्यक्ति को छह बातों का सतत ध्यान रखना चाहिए। वे बातें हैं - समय कौन सा है, स्थान कौन सा है, मेरे मित्र-शत्रु कौन हैं, मेरे आय-व्यय का अनुपात क्या है, मैं कौन हूं और मेरी सामर्थ्य क्या है?

“कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः।”

अपनी सफलता की यात्रा का प्रारंभ आत्मस्वीकार से होना चाहिए। यह आत्मस्वीकार किसी प्रकार की आत्महीनता अथवा आत्ममुग्धता पर नहीं, अपितु स्वस्थ विचारशीलता पर निर्भर होना चाहिए। अपने यथार्थ से बचते हुए सिद्धि की कोई साधना आत्मप्रवंचना बन जाती है।

इतिहास के अनेक प्रसंगों को देखते हुए हमें यह बात बारंबार अनुभव में आती है कि कठिन संघर्ष के पलों में सबसे अच्छे परिणाम उन्हें मिल सके, जिन्होंने स्वयं का सही आकलन किया था। गांवों से निकलकर नगरों-महानगरों में अच्छे जीवन के सपने संजोती पीढ़ी कुछ पाने की चाह में क्या कुछ खोती जा रही है, इसका भी बोध होना चाहिए। बड़े लक्ष्यों की लालसा अथवा महत्वाकांक्षा बुरी नहीं, पर यह सब केवल चाहने से नहीं होता। उसके लिए अपनी उपयुक्तता, अपेक्षित श्रम और अपने क्रमिक विकास की उचित समीक्षा स्वयं करनी होती है। प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा तक पहुंचते हुए अपनी प्राकृतिक क्षमता, प्रयत्न-बल और अपनी छलांग लगाने की शक्ति का सही अनुमान प्रत्येक युवा को होना चाहिए।

अपनी सफलता के लिए अनुकूल क्षेत्र का चयन भी समीक्षा का विषय हो सकता है। पांडव महान योद्धा थे, पर उनमें पांचों की योग्यता का क्षेत्र भिन्न था। सफलता का संघर्ष करती युवा पीढ़ी अपने आवेग को संभालकर उचित प्रबंधन को अंगीकार करे तो उसकी लड़ाई विजय की ओर जा सकती है। प्रेरणाओं और आश्वासनों को भी अपनी प्रकृति के साथ मिलाकर परखना अवश्यक होता है। सीता जी की खोज में निकली वानर-सेना में समुद्र-पार छलांग केवल हनुमान जी ने लगाई। संधि-प्रस्ताव लेकर अंगद गए और सेतु-बंधन नल-नील ने कराया। ये संदर्भ बताते हैं कि शक्ति-सामर्थ्य होने पर भी अपने वैशिष्ट्य को परखे और निखारे बिना नायकत्व प्राप्त नहीं होता।  

जीवन में निरंतर बढ़ते जाते बाह्य प्रभावों एवं आभासी विचारों के साथ अपनी मौलिकता को जीवित रखना तथा अंतर्निहित योग्यता को विकसित होने देना आधुनिक समय में एक कठिन चुनौती है। युवा पीढ़ी के सम्मुख यह चुनौती प्रबल रूप में आती है। निंदा और प्रशंसा के अतिरेक से बचते हुए अपनी दुर्बलताओं को पहचानकर उन्हें दूर करना और अपनी योग्यता का उच्चतम स्तर तक विकास करना आत्मप्रबंधन का मूल विषय है। यह भी अनुभव करना आवश्यक है कि सफलता-विफलता तथा उससे निर्धारित होने वाले उत्तरदायित्व का मानक क्या हो सकता है। संघर्षरत अथवा असफल कहे जाने वाले लोग भी जीवन के मूलभूत साधनों के उपभोक्ता होते ही हैं। मानवीय सद्भाव-सौजन्य की दिशा में उनका योगदान समाज को सदैव वांछित रहता है। ऐसी स्थिति में जीवन का मूल्यांकन अपने किसी चिह्नित लक्ष्य की सिद्धि-असिद्धि मात्र से करना विवेक नहीं कहा जा सकता।

जो कुछ भी नहीं प्राप्त कर सका, वह भी मनुष्य का जन्म तो प्राप्त कर ही चुका है। अतः मनुष्योचित सदाचार की प्रतिबद्धता उसे भी आत्मावलोकन से प्राप्त करनी ही चाहिए। तैयार होता हुआ, भविष्य को रूप-आकार देने को प्रतिबद्ध युवतर नेतृत्व केवल प्राप्तियों से नहीं, बल्कि अपनी प्रतिज्ञाओं से स्वयं को परिभाषित करने तक विकसित हो सके तो हमारा देश अपने गौरव को कहीं अधिक उच्च शिखर पर ले जा सकता है। गौरव की यह यात्रा स्वयं से प्रश्न आमंत्रित करती है कि क्या मैं वही हूं, जो दिखता हूं। क्या मैं नकली परिचय तो नहीं जी रहा हूं।