धन जोड़ते-जोड़ते कहीं मधुमक्खी जैसा हाल न हो जाए! दत्तात्रेय ने बताया पैसों का सही उपयोग
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्तंभ में भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के ...और पढ़ें
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धन का सही उपयोग कैसे करें, मधुमक्खी जैसी गलती से बचें
आचार्य नारायण दास (महंत, श्रीभरत मिलाप आश्रम मायाकुंड, ऋषिकेश)। महाराज यदु को संबोधित करते हुए अवधूत भगवान दत्तात्रेय उपदेशित करते हैं, हे राजन्! परमार्थ तथा सत्संग से विमुख होकर विषय-वासनाओं में लिप्त जीव असीम शारीरिक व मानसिक क्लेश सहकर भी अहर्निश धन-धान्य का संचय करते हैं, किंतु जिस प्रकार अज्ञानी मधुमक्खियां अनवरत परिश्रम से पुष्प-पुष्प का मकरंद एकत्र करती हैं और स्वयं उसका रसास्वादन नहीं कर पातीं, क्योंकि कोई चतुर मधुहा आकर उस मधु का हरण कर लेता है; ठीक उसी प्रकार किसी कृपण द्वारा दुखपूर्वक संचित धन का उपभोग भी कालचक्र, विषम परिस्थितियां, अनधिकारी उत्तराधिकारी अथवा चोर कर लेते हैं।
न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद्दुःखसञ्चितम्।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु।।
हे राजन! पुष्पादि के मकरंद के प्रति अंधी आसक्ति और अथक परिश्रम ही मधुमक्खियों के समूल विनाश की विभीषिका बन जाता है। इसी प्रकार धर्म, दान तथा कल्याणी वृत्ति से विमुख होकर; केवल धन एकत्रित करने वाला लोभी मनुष्य उस संपदा का स्वामी नहीं, अपितु केवल एक मोहासक्त रक्षक है। सनातन संस्कृति की पावन व्यवस्था में गृहस्थ को संचय की अनुमति तो प्राप्त है, किंतु वह आसक्ति के पोषण के लिए नहीं, अपितु परमार्थ की वेदी पर आहुति देने हेतु है।
एक सद्गृहस्थ का परम धर्म है कि वह अपने संचित अन्न व धन से पंचमहायज्ञ, पितृ-तर्पण, अभ्यागत-सेवा, साधु-सत्कार एवं गोग्रास का निष्ठापूर्वक निर्वाह करे, तत्पश्चात अवशिष्ट भाग को भगवत्प्रसाद रूप में ग्रहण करे।
शास्त्रों में धन की केवल तीन गतियां निर्धारित हैं- दान, भोग और नाश। जो मनुष्य न तो सुपात्र को दान देता है और न ही यथोचित उपभोग करता है, उसकी संपदा की तृतीय गति निश्चित विनाश ही होती है।
सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्।।
हे राजन! इस अनित्य संसार में यदि संचय अहंता और ममता के कलुष से युक्त है, तो वह केवल बंधन तथा संताप का कारण बनता है। इसके विपरीत, वही संग्रह यदि संतोष और समर्पण की मंदाकिनी से ओत-प्रोत होकर लोककल्याण में प्रयुक्त होता है, तो मोक्ष का अक्षय द्वार खोल देता है। मनुष्य को धन का दास नहीं, अपितु विवेक की खड्ग से उसका स्वामी बनना चाहिए। वास्तविक परम धन तो संतोष है, सच्ची पवित्रता त्याग में है और संचित संसाधनों की परम सार्थकता जगत के कल्याणार्थ स्वयं को समर्पित कर देने में ही निहित है।
