दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। समर्पण प्रत्येक प्राणी के लिए अत्यंत आवश्यक भाव है। यही वह भाव है जिसके माध्यम से हम अपने आत्मीय जनों के प्रिय बन सकते हैं। यह स्मरण रहे कि राग, द्वेष, घृणा तथा स्वार्थ का त्याग किए बिना समर्पण की कल्पना व्यर्थ है। हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू में समर्पण का भाव आवश्यक है। समर्पण हमारे लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक है। संबंधों में मधुरता के लिए हमें परस्पर समर्पण भाव रखते हुए रिश्तों का निर्वहन करना होता है। स्वार्थ की दृष्टि से बनाए गए रिश्ते अल्पावधि के उपरांत समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी समर्पण भाव का होना अत्यंत आवश्यक है। जब हम अपने संपूर्ण समर्पण के साथ लक्ष्य प्राप्ति के लिए समर्पित हो जाते हैं, तब कोई भी लक्ष्य हमसे दूर नहीं रहता।

समर्पण के साथ-साथ विश्वास का होना भी आवश्यक है। जिस प्रकार एक बीज धरती में रोपित किया जाता है, तो वह संपूर्ण रूप से खुद को धरती मां की गोद में समर्पित कर देता है। तभी उसमें विकास के नए अंकुर फूट पड़ते हैं। भास्कर की किरणों उसे शक्ति प्रदान करती हैं। पवन की शीतलता उसे दुलारती है।

मेघ उसका अभिसिंचन करते हैं। इस प्रकार उसे संपूर्ण प्रकृति का सहयोग एवं साहचर्य मिलने लगता है। उसके बाद वह धीरे-धीरे एक संपूर्ण वृक्ष का आकार ले लेता है। एक ऐसे वृक्ष का, जिसके आश्रय में तमाम प्राणी शीतलता प्राप्त करते हैं। यही नहीं, वह वृक्ष सैकड़ों बीजों के जनक होने का गौरव भी प्राप्त करता है।

अणु से विभु, लघु से विराट बनने की प्रक्रिया आत्मसमर्पण के सांचे और ढांचे में परिपूर्ण होती है। समर्पण हमारे अहंकार को समाप्त करहमें सामाजिक कल्याण हेतु उपयुक्त भी बनाता है। समर्पण से ही किसी का विश्वास अर्जित किया जा सकता है। इसी विश्वास से प्राय: हम जीवन के सबसे अमूल्य अवसर प्राप्त करते हैं। यही अवसर हमारी प्रगति में निर्णायक सिद्ध होते हैं।

(पुष्पेंद्र दीक्षित)

Edited By: Pravin Kumar