धनतेरस पर क्यों किया जाता है यमदीप दान? जानिए यमराज के दीपक और नरक चौदस के दीपक में क्या है अंतर
धनतेरस पर यमदीप दान क्यों किया जाता है? जानिए यमराज के नाम जलाए जाने वाले दीपक की पौराणिक कथा, उसका ...और पढ़ें

कब किसके लिए करें दीपदान? (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है। इस दिन लोग भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा करने के साथ सोना, चांदी और बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं। लेकिन धनतेरस की शाम एक और विशेष रस्म निभाई जाती है, जिसे यमदीप दान कहा जाता है। इस रस्म में घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है।
इस विषय पर हमारी बात वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के गोस्वामी सेवक समिति के सदस्य एंव पंडित श्रीनाथ गोस्वामी जी से हुई है। वो कहते हैं, " ऐसा करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और घर में सुख-शांति बनी रहती है।" लेकिन क्या आप जानते हैं कि यमदीप दान और नरक चौदस पर जलाए जाने वाले दीपकों में क्या अंतर है? आइए जानते हैं इसका धार्मिक महत्व।
क्या होता है यमदीप दान?
धनतेरस के दिन शाम के समय यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा हैं। इसे यम दीपम भी कहा जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार, यमराज मृत्यु के देवता हैं और मनुष्य के जीवन-मृत्यु का लेखा-जोखा रखते हैं।
पंडित श्रीनाथ गोस्वामी
धनतेरस पर श्रद्धापूर्वक यमदीप जलाने और उसका दान करने से परिवार के ऊपर से अकाल मृत्यु का संकट टलता है। इस दिन लोग यमराज से परिवार के सभी सदस्यों की लंबी उम्र,अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की प्रार्थना करते हैं।
दक्षिण दिशा में ही क्यों जलाया जाता है यम का दीपक?
दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। यही कारण है कि धनतेरस पर यमदीप को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाया जाता है। पंडित श्रीनाथ गोस्वामी कहते हैं, " घर के मुख्य द्वार के बाहर आटे या मिट्टी का दीपक रखा जाता है। इसमें सरसों या तिल का तेल डालकर चार बातियां जलाई जाती हैं। दीपक को जलाने से पहले उसके पास जल, फूल और अक्षत भी रखे जाते हैं।" इस दौरान यमराज से प्रार्थना की जाती है कि परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा करें और उन्हें दीर्घायु प्रदान करें।
यमदीप दान से जुड़ी कथा
यमदीप दान के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा भी है। मान्यता के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग था। जब उनकी पत्नी को इस बात का पता चला तो उन्होंने पूरी रात जागकर घर के प्रवेश द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और दीपक सजाए। उन्होंने अपने पति को सोने नहीं दिया और गीत-संगीत से उन्हें जगाए रखा। कहा जाता है कि यमराज सर्प के रूप में आए, लेकिन दीपकों की रोशनी और आभूषणों की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। इस तरह राजकुमार की जान बच गई। इस लिए धनतेरस के दिन कई घरों में सोने चांदी की पूजा होती है और पूरी रात उन्हें तिजोरी के बाहर निकाल के रखते हैं और उनकी पूजा होती है। रात भर सोने चांदी के इन गहनों को तिजोरी से बाहर ही रखा जाता है। जो चांदी या सोना नहीं खरीद पाते हैं वो पीतल और स्टील का सामान खरीदते हैं। साथ ही मुख्य द्वार पर यम के नाम का दीपक भी जलाया जाता है।
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