बर्तन-गहने नहीं, धनतेरस पर राजस्थानी करते हैं आंगन और चौखट की विशेष पूजा; 100 साल से भी पुरानी है परंपरा
धनतेरस पर राजस्थान की 100 साल पुरानी परंपरा, जहां सोना-चांदी नहीं बल्कि पीली-लाल मिट्टी को असली धन मानकर पूजा की ...और पढ़ें

मिट्टी की पूजा । (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धनतेरस का त्योहार आते ही बाजारों में सोना, चांदी, बर्तन और नए सामान दुकाने सजने लगती हैं। मान्यता है कि इस दिन नई वस्तुएं खरीदने से घर में सुख-समृद्धि आती है। लेकिन राजस्थान के जोधपुर, उदयपुर और अन्य मरवाड़ क्षेत्रों में धनतेरस मनाने की एक ऐसी अनोखी परंपरा है, जो प्रकृति से जुड़ी है। यहां आज भी कई घरों में धनतेरस के दिन सोने-चांदी के साथ पीली और लाल मिट्टी को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन घर के आंगन और चौखट को मिट्टी से लीपकर विशेष पूजा की जाती है। आइए जानते हैं इस परंपरा का धार्मिक महत्व।
मिट्टी को माना जाता है असली धन
मारवाड़ी समाज में मिट्टी को केवल जमीन या धूल नहीं, बल्कि जीवन और समृद्धि का आधार माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीली और लाल मिट्टी में माता लक्ष्मी का वास होता है। धरती ही हमें अन्न, पानी और जीवन के लिए जरूरी संसाधन देती है। इसलिए धनतेरस के दिन मिट्टी की पूजा की जाती है। इस दिन मिट्टी को घर लाना सुख-समृद्धि और खुशहाली के आगमन का प्रतीक माना जाता है।
आंगन और चौखट लीपने का धार्मिक महत्व
पुराने समय में घरों के आंगन, दीवारों और चौखट को गोबर तथा पीली या लाल मिट्टी के मिश्रण से लीपने की परंपरा थी। धनतेरस पर भी कई घरों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है। इसका धार्मिक महत्व साफ-सफाई से है। माना जाता है कि देवी लक्ष्मी का वास केवल उस घर में होता है, जहां साफ-सफाई होती है।
मान्यता है कि मिट्टी से घर का आंगन लीपने से घर पवित्र होता है और नकारात्मकता दूर होती है। दीवाली से पहले घर की सफाई और शुद्धिकरण का भी महत्व है। माना जाता है कि स्वच्छ और पवित्र घर में ही माता लक्ष्मी का आगमन होता है। इसलिए आंगन और चौखट को सजाकर मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी की जाती है।
कैसे की जाती है मिट्टी की विशेष पूजा?
इस रस्म को निभाने के लिए घर की सुहागिन महिलाएं धनतेरस की सुबह सूर्योदय से पहले करके पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं। इसके बाद वे जल, कुमकुम, अक्षत, दीपक और धान लेकर खेतों या मिट्टी वाले स्थान पर जाती हैं।
इसके बाद सबसे पहले भूमि पर स्वास्तिक बनाया जाता है और फिर पीली और लाल मिट्टी की पूजा की जाती है। महिलाएं धरती माता से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं। इसके बाद मिट्टी को किसी पात्र या कलश में रखकर सिर पर उठाया जाता है और मंगल गीत गाते हुए घर लाया जाता है। घर पहुंचकर इस मिट्टी से आंगन और चौखट को लीपा जाता है।
अत: धनतेरस पर मिट्टी की पूजा से हमें शिक्षा मिलती है की जीवन में केवल पैसा, सोना और चांदी ही नहीं महत्वपूर्ण है, बल्कि धरती माता, जो हमें अन्न और जल देती हैं, रहने के लिए स्थान देती हैं, उनको याद रखना और और हमेशा प्रकृति की सुरक्षा के लिए तैयार रहना भी खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है।
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