विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

आखिर त्रिकुटा पर्वत पर ही क्यों बसीं माता वैष्णो देवी, क्या है इसके पीछे का पौराणिक रहस्य?

Published: Tue, 13 Oct 2026 12:51 PM (IST)

शारदीय नवरात्र के दौरान माता वैष्णो देवी के त्रिकुटा पर्वत पर निवास करने के पीछे एक पौराणिक कथा है। यह ...और पढ़ें

माता वैष्णो देवी की कथा (Picture Credit: AI Generated)

माता वैष्णो देवी की कथा (Picture Credit: AI Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र का पावन उत्सव चल रहा है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने का विधान है। शारदीय नवरात्र में देशभर में मां दुर्गा के मंदिरों में खास रौनक देखने को मिलती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता रानी के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। वहीं, जम्मू के कटरा में स्थित पवित्र त्रिकुटा पर्वतों पर माता वैष्णो देवी (Mata Vaishno Devi) का मंदिर है। शारदीय नवरात्र में भक्त इस मंदिर तक पहाड़ों की चढ़ाई कर 'जय माता दी' का जयघोष करते हैं।

इस उत्सव के लिए मंदिर को बेहद सुंदर तरीके से सजाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वैष्णो देवी ने त्रिकुटा पर्वत को ही अपना निवास स्थान क्यों चुना? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।

माता वैष्णो देवी से जुड़ी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, वैष्णो देवी के जन्म की कथा भगवान विष्णु के अंश से जुड़ी हुई है। दक्षिण भारत में रत्नाकर के घर एक कन्या का जन्म हुआ था, जिसने ध्यान और तपस्या का मार्ग चुना। वनवास के दौरान जब भगवान राम उस कन्या के पास आए, तो वैष्णवी ने उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में पहचान लिया और खुद को उनमें विलीन करने की प्रार्थना की। राम जी ने कहा कि अगर वैष्णवी वनवास के बाद उन्हें फिर से पहचान लेंगी, तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होगी।

भगवान श्री राम ने वैष्णवी को दिया ये आदेश

इसके बाद एक बार राम जी वृद्ध व्यक्ति के भेष में आए, लेकिन उस दौरान वैष्णवी उन्हें पहचान नहीं सकीं। तब भगवान ने कन्या को सांत्वना दी कि कलियुग में 'कल्कि' अवतार के समय उनकी यह इच्छा पूरी होगी। साथ ही भगवान श्री राम ने उन्हें त्रिकूट पर्वत पर जाकर ध्यान करने का आदेश दिया।

इसके बाद वैष्णवी त्रिकूट पर्वत पर जाकर ध्यान में लीन हो गईं। जब भैरों नाथ ने वैष्णवी को देखा, तो उनके पास अस्त्र-शस्त्र थे। वैष्णवी के सौंदर्य को देखकर भैरों नाथ मोहित हो गया और विवाह के लिए उन्हें परेशान करने लगा। भैरों नाथ से बचने के लिए वैष्णवी पहाड़ों की तरफ चली गईं।

भैरों नाथ को हुआ अपनी गलती का अहसास

अर्धकुंवारी में रुकने के बाद वे पवित्र गुफा तक पहुंचीं। जब भैरों नाथ गुफा तक भी पहुंच गया, तो देवी ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अंतिम समय में भैरों नाथ को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने माता से क्षमा मांगी। इसके बाद वैष्णवी ने अपने मानव रूप का त्याग किया और एक चट्टान का रूप धारण कर सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यही पवित्र गुफा आज श्री माता वैष्णो देवी जी के तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

यह भी पढ़ें- बारिश और घने बादलों के बीच भव्य रोशनी से जगमगाया मां वैष्णो देवी का दरबार, उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

यह भी पढ़ें- शारदीय नवरात्र में पहली बार जा रहे हैं दिल्ली से वैष्णो देवी? नोट कर लें सबसे आसान रूट

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।