रावण वध से पहले भगवान श्रीराम ने क्यों की थी इस देवी की पूजा? दशहरा से जुड़ा यह प्रसंग जानना है जरूरी
दशहरा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। रावण ...और पढ़ें

दशहरे का रहस्य: श्रीराम ने क्यों पूजी थीं ये देवी? (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में दशहरा के पर्व का विशेष महत्व है। इस पर्व को हर साल बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक के रूप में बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण में बताया गया है कि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध किया था। इसलिए दशहरा के दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।
वराह पुराण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने युद्ध करने से पहले देवी अपराजिता की आराधना की थी। इसके बाद ही प्रभु ने रावण का अंत किया। इस बात को जानकर आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर भगवान श्रीराम ने माता अपराजिता की पूजा-अर्चना क्यों की? ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको विस्तार से रामायण के इस प्रसंग के बारे में बताते हैं।
क्या है अपराजिता का अर्थ?
'अपराजिता' का अर्थ है वह जो कभी पराजित न हो। विजयदशमी के दिन देवी अपराजिता की पूजा-अर्चना करना अधिक फलदायी माना जाता है।
क्यों की थी पूजा?
भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण से युद्ध करने से पूर्व विजय का आशीर्वाद पाने के लिए देवी अपराजिता की आराधना की थी, ताकि उन्हें और उनकी सेना को रावण पर निश्चित विजय प्राप्त हो सके। देवी अपराजिता को मां दुर्गा या देवी वैष्णवी का ही स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विजयदशमी के दिन स्नान के बाद देवी अपराजिता की पूजा-अर्चना करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और हर क्षेत्र में सफलता पाने का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही सुख-समृद्धि में भी वृद्धि होती है।
दशहरा पर कैसे करें अपराजिता की पूजा?
दशहरा के दिन माता अपराजिता की पूजा-अर्चना अपराह्न काल में करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पूजा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
दशहरे के दिन सुबह स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। पूजा के समय उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक साफ चौकी पर देवी अपराजिता की मूर्ति या चित्र विराजमान करें। उन्हें रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। इसके पश्चात देसी घी का दीपक जलाकर आरती करें और भोग लगाएं। अंत में सभी लोगों में प्रसाद बांटें।
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