मातृ नवमी 2026: पितृ पक्ष में महिलाओं के श्राद्ध के लिए क्यों खास है यह तिथि? पढ़ें इसका पौराणिक महत्व
पितृ पक्ष में मातृ नवमी का विशेष महत्व है, यह तिथि दिवंगत महिला पूर्वजों के श्राद्ध के लिए समर्पित है। ...और पढ़ें

पितृ पक्ष में मातृ नवमी का महत्व, क्यों है यह तिथि खास (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
मातृ नवमी पितृ पक्ष में महिला पूर्वजों के श्राद्ध हेतु विशेष है।
नौ अंक दैवीय शक्ति व स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
श्राद्ध से मातृ ऋण से मुक्ति मिलती है, पूर्वज आशीर्वाद देते हैं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पितृ पक्ष के सोलह दिनों का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दौरान पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से भोजन और जल ग्रहण करते हैं। श्राद्ध की इस विधि को तर्पण भी कहा जाता है।
इस दौरान लोग पितरों का श्राद्ध उस तिथि में करते हैं जिसमें उनकी मृत्यु हुई हो। पितृ पक्ष की हर एक तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन इनमें से मातृ नवमी को बहुत खास माना जाता है।
पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है और इस दिन सभी महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है। आइए आपको बताते हैं इस तिथि पर महिलाओं का श्राद्ध करने के कारण और इसके महत्व के बारे में।
महिलाओं के श्राद्ध के लिए पितृ पक्ष का नौवां दिन ही क्यों?
पितृ पक्ष में सभी महिलाओं का श्राद्ध नवमी तिथि के दिन एक साथ किया जाता है, जिसे मातृ नवमी कहा जाता है। अगर हम अंक ज्योतिष की बात करें तो नौ अंक को दैवीय शक्ति से जोड़ा जाता है और इसका बहुत महत्व होता है। यह पूर्णता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है।
इसलिए, नवमी तिथि को माताओं को याद करने के लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है। यही नहीं नौरात्रि के नौ दिन भी नौ देवियों को समर्पित होते हैं, जिसमें भी संख्या नौ आती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार, पितृपक्ष में पितृ और मातृ दोनों तरह के पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने का महत्व बताया गया है। यदि किसी व्यक्ति को किसी महिला पूर्वज की मृत्यु तिथि नहीं ज्ञात है तब भी उनका श्राद्ध मातृ नवमी पर ही होता है और इसी दिन महिला पूर्वजों को विदाई दे दी जाती है।
पितृ पक्ष में मातृ नवमी पर श्राद्ध करने का महत्व
मातृ नवमी पर किसी भी मृत महिला जैसे दादी, नानी या अन्य, इन सभी का श्राद्ध एक साथ किया जाता है। इस श्राद्ध को करने से मातृ ऋण से मुक्ति मिलती है और सभी माताएं अपने कुल को समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसी कारण से मातृ नवमी का श्राद्ध बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
यही नहीं जो व्यक्ति इस तिथि का श्राद्ध नहीं करता है उससे पूर्वज महिलाएं अतृप्त होकर ही वापस अपने लोक लौट जाती हैं और वंशजों को आशीर्वाद देने के बजाय उनसे नाराज हो जाती हैं। यही नहीं इससे कुल में मातृ ऋण लग जाता है इससे बाहर निकल पाना मुश्किल होता है।
कैसे किया जाता है मातृ नवमी का श्राद्ध?
मातृ नवमी का श्राद्ध भी अन्य पूर्वजों की ही तरह किया जाता है और इसके कुछ नियम बनाएं गए हैं उनका पालन भी जरूरी होता है।
- इस दिन घर की बहुएं विधि पूर्वक श्राद्ध करती हैं और पूर्वजों को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद लेती हैं।
- श्राद्ध के लिए दिवंगत मां या मातृ-पक्ष की पूर्वज महिलाओं की तस्वीर किसी चौकी पर रखें और उनके सामने चावल के पिंड बनाकर रखें।
- जल में काले तिल मिलाकर तर्पण करें और साथ में तर्पण का मंत्र- तस्मै स्वधा नमः पढ़ें। काले तिल, कुश घास और फूलों के साथ मातृ पूर्वजों के निमित्त जल अर्पित करें।
- श्राद्ध में पवित्र अग्नि जलाई जाती है। पका हुआ भोजन, फल और मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। आप तर्पण और श्राद्ध के बाद गाय के गोबर के कंडों में अग्नि जलाकर हवं करें और पूर्वजों की विदाई करें।
- इस दिन ब्राह्मण महिलाओं को भोजन कराने का विधान है। साथ ही, कौए, गाय और कुत्ते को भी भोजन कराया जाता है।
पुराणों के अनुसार, मातृ नवमी का श्राद्ध न करने से जीवन में दुर्भाग्य आ सकता है। वहीं विधि-विधान के साथ इसका पालन करने से घर में सदैव खुशहाली बनी रहती है।
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