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जब क्रोध से काला पड़ गया मां का मुख! मां दुर्गा को कैसे मिला 'काली' नाम? एक हुंकार और थर्रा उठे थे असुर

Published: Sun, 18 Oct 2026 06:00 PM (IST)

मां दुर्गा ने काली का विकराल रूप क्यों धारण किया और उन्हें यह नाम कैसे मिला, इसके बारे में हम ...और पढ़ें

कैसे मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार कर सृष्टि को बचाया (Picture Credit: AI Generated)

कैसे मां दुर्गा ने रक्तबीज का संहार कर सृष्टि को बचाया (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. मां काली ने रक्तबीज असुर का संहार किया।

  2. रक्तबीज के रक्त से नए असुर बनते थे।

  3. शिव पर पैर रखने से क्रोध शांत हुआ।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में माता दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में सबका अपना अलग महत्व है और सभी स्वरूपों की पूजा का अलग फल मिलता है। उन्हीं में से मां दुर्गा का एक स्वरूप है मां काली का जिन्हें शक्ति, साहस और दुष्टों के संहार का प्रतीक माना जाता है। मां काली को अक्सर श्याम वर्ण वाली प्रतिमा के रूप में देखा जाता है, लेकिन क्या आपने सोचा है कि माता दुर्गा ने काली रूप क्यों धारण किया और उनका नाम काली क्यों पड़ा?

धार्मिक मान्यताओं और देवी से जुड़ी कथाओं में मां के विभिन्न रूपों का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि जब-जब अधर्म और दुष्ट शक्तियों का प्रभाव बढ़ता है, तब मां अपने भक्तों की रक्षा और असुरों के विनाश के लिए उग्र रूप धारण करती हैं। मां काली का स्वरूप भी इसी असीम शक्ति और दुष्टों के संहार का प्रतीक माना जाता है। आइए आपको बताते हैं मां काली के नाम और उनके इस स्वरूप की कथा।

माता ने क्यों धारण किया काली का स्वरूप?

यह कथा उस भयानक संकट की है, जब सृष्टि पर रक्तबीज नाम के असुर का आतंक इतना बढ़ गया कि देवताओं और मनुष्यों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा था। उस असुर को मारना असंभव था। उसका नाम रक्तबीज था और उसे वरदान था कि उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद यदि धरती पर गिरेगी, तो उस बूंद से हूबहू उसके जैसा ही दूसरा महाबली रक्तबीज पैदा हो जाएगा। इसी कारण से उस बाहुबली का आतंक बढ़ने लगा। वह शुंभ और निशुंभ का मुख्य सेनापति था और इसी विचित्र वरदान से और ज्यादा शक्तिशाली बन गया था।

दुर्गा सप्तशती की कथाओं के अनुसार, देवताओं के आग्रह पर जब माता दुर्गा ने देवी चंडिका के रूप में रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उसके घावों से रक्त की सैकड़ों बूंदें पृथ्वी पर गिरने लगीं। देखते ही देखते उन बूंदों से हजारों रक्तबीज पैदा हो गए। देवताओं और माता दुर्गा की सेना ने जब उन सभी रक्तबीजों पर वार किया, तो उनकी संख्या और भी बढ़ने लगी। हजारों से लाखों और लाखों से करोड़ों रक्तबीज रणभूमि में खड़े हो गए।

चारों ओर केवल रक्तबीज ही दिखाई देने लगे। आकाश से पाताल तक चीखें और असुरों की अट्टहास गूंजने लगे। सभी देवता भयभीत होकर पीछे हटने लगे। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी थी कि रक्तबीज का संहार करना असंभव नजर आने लगा। उस समय माता दुर्गा ने रक्तबीज के संहार के लिए काली रूप धारण किया और उनका नाम मां कलिका पड़ा।

माता दुर्गा ने कैसे किया रक्तबीज का संहार?

जब रक्तबीज का आतंक इतना बढ़ गया तब देवी चंडिका के भीतर संहार की चेतना जाग उठी। उनके ललाट की भृकुटि से घोर अंधकार के समान एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। उस अंधकार के गर्भ से एक ऐसा भयानक स्वरूप सामने आया, जिसे देखकर साक्षात मृत्यु भी भयभीत हो जाए।

मां काली का यह स्वरूप इतना विकराल था कि उससे तुरंत ही असुरों का विनाश होने लगा और रक्तबीज के अलग-अलग स्वरूप नष्ट होने लगे। रणभूमि में पहुंचते ही मां कालरात्रि ने देवी चंडिका से कहा कि वे रक्तबीज पर अपने अस्त्रों से प्रहार करें और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही वे ग्रहण कर लेंगी।

इसके बाद देवी चंडिका ने रक्तबीज पर प्रहार करना शुरू किया। जैसे ही उसके शरीर से रक्त की धाराएं निकलीं, मां कालरात्रि ने अपनी विशाल जीभ और रक्त ग्रहण करने वाले पात्र की सहायता से रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से रोक दिया।

रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध कर माता काली तथा मां दुर्गा ने तीनों लोकों को भय मुक्त किया। माता काली का क्रोध इतना विकराल था कि उस क्रोध की ज्वाला से सम्पूर्ण सृष्टि जलने लगी। उस समय भगवान शिव पृथ्वी पर लेट गए और माता काली का पैर शिव जी के ऊपर आ गया। उस समय जब माता काली को यह एहसास हुआ कि उनका पैर उनके पति के ऊपर आ गया है उस समय माता काली का क्रोध शांत हुआ, लेकिन उनकी जिह्वा बाहर निकल आई।

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