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राजा बलि का महल छोड़ देवराज इंद्र के पास क्यों चली गईं थीं मां लक्ष्मी? पढ़ें महाभारत के शांति पर्व का रोचक रहस्य

Published: Sun, 01 Nov 2026 04:00 PM (IST)

महाभारत के शांति पर्व के अनुसार, मां लक्ष्मी ने राजा बलि का महल छोड़कर देवराज इंद्र के पास निवास क्यों ...और पढ़ें

असुरों के पास सब कुछ था, फिर भी मां लक्ष्मी ने क्यों छोड़ा उनका साथ? (Picture Credits- AI Images)

असुरों के पास सब कुछ था, फिर भी मां लक्ष्मी ने क्यों छोड़ा उनका साथ? (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, दीवाली (Diwali 2026) का पर्व 8 नवंबर को मनाया जाएगा। इस शुभ अवसर पर धन की देवी मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दीवाली के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर धन लाभ के योग बनते हैं और जीवन में आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, धन, वैभव और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का स्वभाव अत्यंत चंचल माना गया है। वे केवल धर्म, सत्य और सदाचार वाले स्थान पर ही निवास करती हैं। महाभारत के शांति पर्व में बताया गया है कि एक समय मां लक्ष्मी राजा बलि को छोड़कर सीधे देवराज इंद्र के पास रहने चली गई थीं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि मां लक्ष्मी देवराज इंद्र के यहां निवास करने पहुंची थीं? आइए जानते हैं इससे जुड़े पौराणिक रहस्य के बारे में।

स्वर्ग में क्यों पहुंची मां लक्ष्मी?

पौराणिककथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी का स्वर्गलोक में आगमन हुआ। उन्होंने देवराज इंद्र से कहा, "हे देवराज, अब मैं आपके यहाँ निवास करना चाहती हूं।" इस पर विस्मित होकर देवराज इंद्र ने कहा, "हे देवी! आप तो असुरों के यहां बड़े आदर-सत्कार के साथ रह रही थीं और वहां आपको किसी प्रकार का कष्ट भी नहीं था। मैंने पूर्व में भी आपसे स्वर्गलोक पधारने का कई बार निवेदन किया था, आप नहीं आईं। फिर आज बिना बुलाए आपका यहां कैसे आगमन हुआ? कृपया मुझे इसका कारण बताइए।"

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(Picture Credits- AI Images)

इस पर मां लक्ष्मी ने उत्तर दिया, "हे इंद्र! कुछ समय पहले तक असुर धर्मात्मा थे और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते थे। किंतु अब वे अधर्म के मार्ग पर चलने लगे हैं, इसलिए अब मेरा वहाँ रहना संभव नहीं है। जिस स्थान पर प्रेम और सौहार्द की जगह ईर्ष्या, क्रोध और कलह आ जाए, दुर्गुण और अधर्म घर कर ले, वहां मैं कभी नहीं ठहरती। ऐसे दूषित वातावरण में मेरा निर्वाह नहीं हो सकता। इसलिए उन दुराचारी असुरों का त्याग कर मैं तुम्हारे इस सद्गुणी स्थान पर रहने आई हूं।" तब देवराज इंद्र ने पूछा, "हे देवी! वे और कौन-से कारण व दोष हैं, जिनके चलते आपने असुरों का साथ छोड़ दिया?"

मां लक्ष्मी ने बताया कारण

तब देवी लक्ष्मी ने बताया, "जो लोग अपने पितरों का तर्पण और दान-पुण्य नहीं करते, उनके यहां दरिद्रता का वास होता है। इसके अलावा जिस घर में भोजन बनाते समय और परिवेश में शुचिता व पवित्रता का ध्यान नहीं रखा जाता, वहाँ भी मैं नहीं रहती। मेरा वास केवल वहीं संभव है जहाँ तन, मन और वातावरण की शुद्धता हो, तथा जिस परिवार में पति-पत्नी एक-दूसरे का आदर-सम्मान करते हों।"

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(Picture Credits- AI Images)

श्री महालक्ष्मी अष्टकम् की किसने की रचना?

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दुर्वासा के शाप के प्रभाव से स्वर्ग सहित तीनों लोक श्रीहीन हो गए थे। तब इस घोर संकट से मुक्ति पाने और महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए देवराज इंद्र ने 'श्री महालक्ष्मी अष्टकम्' की रचना कर देवी की भावपूर्ण स्तुति की थी। इंद्र की इस आराधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया, जिससे देवराज इंद्र और समस्त देवलोक को उनका खोया हुआ वैभव और श्री पुनः प्राप्त हो सकी।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

 

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