छठ पूजा में पवित्र जल में आधा डूबकर ही क्यों दिया जाता है सूर्य को अर्घ्य? जानें धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
छठ पूजा में व्रती पवित्र जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इस परंपरा के पीछे धार्मिक, ...और पढ़ें

छठ पूजा में पानी में आधा डूबकर ही सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है? (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
जल में खड़े होकर अर्घ्य प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक।
आध्यात्मिक रूप से मन और शरीर को शांत करता है।
उगते-डूबते सूर्य को अर्घ्य जीवन में संतुलन सिखाता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। छठ पूजा हिंदू धर्म के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित होता है। इस दौरान व्रती महिलाएं और पुरुष संतान की सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए कठिन व्रत रखते हैं। छठ पूजा में उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की विशेष परंपरा है। इस दौरान व्रती नदी, तालाब या किसी पवित्र जलाशय में कमर या छाती तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को जल अर्पित करते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि छठ पूजा में पानी में आधा डूबकर ही सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है? इसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक महत्व से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में जल को जीवन का आधार और पवित्र माना गया है। नदियों, तालाबों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है। छठ पूजा में व्रती जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इसे प्रकृति और जल तत्व के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि सूर्य देव संपूर्ण संसार को ऊर्जा और प्रकाश प्रदान करते हैं, जबकि जल जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करना प्रकृति के दोनों महत्वपूर्ण तत्वों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक है।
आधे जल में डूबकर अर्घ्य देने की क्या है मान्यता?
छठ पूजा के दौरान व्रती कमर या छाती तक जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इसके पीछे आध्यात्मिक मान्यता भी जुड़ी है। माना जाता है कि जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करने से व्यक्ति अपने मन और शरीर को शांत रख पाता है।
यह परंपरा मनुष्य को प्रकृति के करीब रहने और उसके प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देती है। जल में खड़े होकर अर्घ्य देना व्रती के समर्पण, श्रद्धा और संकल्प का भी प्रतीक माना जाता है।
सूर्य की किरणों और जल से जुड़ा है वैज्ञानिक दृष्टिकोण
सूर्य की रोशनी हमारे शरीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इससे शरीर को विटामिन डी बनाने में मदद मिलती है और प्राकृतिक रोशनी शरीर की जैविक घड़ी यानी बॉडी क्लॉक को नियमित रखने में भी भूमिका निभाती है।
छठ पूजा में सुबह और शाम के समय सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इन समयों में सूर्य की रोशनी अपेक्षाकृत कम तीव्र होती है। जल में खड़े होकर अर्घ्य देने के दौरान पानी में सूर्य की किरणों का प्रतिबिंब दिखाई देता है। सूर्य को देखते समय सीधे उसकी ओर आंखें टिकाकर देखना भी नुकसानदायक हो सकता है।
जीवन में संतुलन बनाने का संदेश देता है छठ का अर्घ्य
छठ पूजा में डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पीछे जीवन से जुड़ा एक सुंदर संदेश माना जाता है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना यह सिखाता है कि जीवन में हर परिस्थिति का सम्मान करना चाहिए। वहीं उगते सूर्य की पूजा नई शुरुआत, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती है। जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना भी इसी भाव को दर्शाता है कि जीवन में सुख-दुख और उतार-चढ़ाव के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
छठ पूजा में जल और सूर्य दोनों की होती है विशेष पूजा
छठ पूजा में जल और सूर्य दोनों को विशेष महत्व दिया जाता है। व्रती पवित्र जल में खड़े होकर पूरी श्रद्धा से सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान, आस्था, अनुशासन और कृतज्ञता का संदेश देती है। यही वजह है कि छठ पूजा में पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
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