छठ पूजा पर डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य क्यों दिया जाता है? परंपरा में छुपा है गहरा रहस्य
छठ महापर्व में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा का गहरा महत्व है, जो आस्था और विज्ञान का ...और पढ़ें

छठ पूजा: डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य देने का रहस्य और महत्व (Picture Credit: AI Genrated)
HighLights
डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की अनोखी परंपरा।
36 घंटे का निर्जला उपवास, आस्था का प्रतीक।
जल में अर्घ्य से पीनियल ग्रंथि जागृत, ऊर्जा वृद्धि।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। छठ जिसे केवल पर्व नहीं बल्कि महापर्व कहा जा सकता है। इसमें एक मां जहां एक तरफ बच्चों की सलामती की कामना में 36 घंटों का निर्जला उपवास करती है, वहीं पिता परिवार के साथ घंटों नदी के घाट पर खड़े होकर संतान की समृद्धि की कामना करता है।
कुछ ऐसा ही है यह महापर्व जो सदियों से करोड़ों लोगों की आस्था को एक धागे में पिरोए हुए है। इसी पर्व की एक महत्वपूर्ण परंपरा है सूर्य को अर्घ्य देना। छठ पूजा में मुख्य्र रूप से सूर्य को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है और सबसे अनोखी परंपरा का हिस्सा है पहले डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देना, फिर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर संतान की दीर्घायु की कामना करना।
अक्सर इसे लेकर मन में सवाल आता है कि आखिर क्यों छठ में पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है? आइए जानें क्या है इस परंपरा का अर्थ और महत्व?
छठ पूजा में डूबते सूर्य को क्यों अर्घ्य दिया जाता है?
ऐसा कहा जाता है कि पूरी दुनिया उगते सूरज को सलाम करती है, लेकिन सनातन धर्म एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो डूबते सूरज की भी उतनी ही वंदना करती है, जितनी उगते सूर्य की। ब्रह्मवैवर्त पुराण कहता है कि छठी मईया ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना है, जो प्रकृति की छठी दिव्य शक्ति हैं।
एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में जब राजा प्रियंवद का पुत्र मृत पैदा हुआ तो पूरे राजमहल में हाहाकार मच गया। राजा विलाप करते हुए बोले, मेरा वंश पैदा होते ही खत्म हो गया, तो फिर यह राज्य कैसे चलेगा। तभी वहां देवी षष्ठी प्रकट हुईं और राजा के बेटे को जीवित कर दिया।
उसी समय से लोग छठ माता की पूजा अपनी संतान की सलामती के लिए करने लगे। इस पर्व में डूबते सूर्य को अर्घ्य इस मान्यता के साथ दिया जाता है कि जो अस्त हुआ है वो अगले दिन फिर ये उपाय होगा। यह पर्व सिखाता है कि सिर्फ उगते हुए सूरज का नहीं, बल्कि डूबते हुए सूरज का भी वैसा ही समाना होना चाहिए।
पानी में खड़े होकर अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
अब सवाल यह उठता है कि पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है? इसका सीधा उत्तर वेदों में वर्णित है। सामवेद के अनुसार, जब साधक कमर तक जल में खड़ा होकर तांबे के पात्र से डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देता है तो सूर्य की किरणें जल से छनकर आंखों के माध्यम से सीधे पीनियाल ग्रंथि को जागृत करती हैं और शरीर की ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
इस तरह से यह सिर्फ एक पूजा नहीं, भक्ति और विज्ञान का अद्भुत संगम भी है। सनातन सिखाता है कि जो डूबा है उसका उदय भी निश्चित है। इसी भावना के साथ लोग डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और जल में खड़े होकर ही अर्घ्य देते हैं।
36 घंटे क्यों रखा जाता है निर्जला उपवास?
वास्तव में 36 घंटे निर्जला उपवास करना व्रती महिलाओं की आस्था और छठी मैया का आभार व्यक्त करने का एक तरीका है। मां की प्रार्थना में बच्चों का भविष्य होता है, परिवार की सलामती और अपनों की खुशियों का सपना होता है, जो उन्हें 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास करने की शक्ति देता है।
वास्तव में छठ महापर्व माताओं के धैर्य और संयम का प्रतीक है जो उन्हें निर्जला व्रत करने और भूखे रहकर छठ मैया की पूजा करने की प्रेरणा देता है।
छठ महापर्व का सबसे पवित्र दिन होता है संध्या अर्घ्य का जिसमें सूर्यास्त के समय नदियों कर तालाबों पर एक साथ खड़े होकर महिलाएं सूर्य को अर्घ्य देती हैं और अगले दिन उसके उदय होने की मंगलकामना करती हैं।
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