सिर्फ कार्तिक नहीं, चैत्र में भी पुकारती है छठी मइया: पढ़िए 4 दिन के इस सबसे बड़े पर्व की महिमा
छठ महापर्व उत्तर भारत का एक प्रमुख 4 दिवसीय त्योहार है, जो साल में दो बार (कार्तिक और चैत्र माह ...और पढ़ें

कार्तिक और चैत्र छठ की महिमा
HighLights
छठ महापर्व साल में दो बार, कार्तिक और चैत्र माह में।
चार दिवसीय व्रत में उगते-डूबते सूर्य की पूजा।
नहाय खाय, खरना, संध्या अर्घ्य, उषा अर्घ्य प्रमुख रस्में।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। छठ त्योहार उत्तर भारत का एक ऐसा महापर्व जिसका इंतजार साल भर किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत वर्तमान समय में यह पर्व भारतवर्ष में मनाया जाने लगा है। हालांकि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह एक प्रमुख हिंदू त्योहार है। छठ महापर्व एकमात्र ऐसा मौका है जब उगते सूर्य और डूबते सूर्य की पूजा की जाती है।
हिंदू कैलेंडर के हिसाब छठ पूजा कार्तिक माह के छठें दिन मनाई जाती है, जिस वजह से छठ पर्व को 'सूर्य षष्ठी' के नाम से भी जाना जाता है। चार दिन का सबसे कठिन व्रत जिसका पालन बेहद संयम और पवित्रता के साथ किया जाता है। इस साल 4 दिवसीय छठ की शुरुआत 13 नवंबर को नहाय खाय से शुरू होकर छठ पूजा उषा अर्घ्य 16 नवंबर को समाप्त होगा।

साल में कितनी बार छठ?
बहुत से लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि, साल में एक बार नहीं, बल्कि 2 बार छठ महापर्व (Chhath Puja 2026) का उत्सव मनाया जाता है। बहुत से लोगों को यह सुनकर अजीब लग सकता है लेकिन यह सच है।
दरअसल कार्तिक महीने के अलावा चैत्र के महीने में भी छठ मनाया जाता है। हालांकि ये दोनों छठ में कोई बड़ा अंतर नहीं है। चैत्र माह में आने वाली छठ की पूजा विधि भी कार्तिक माह में आने वाली छठ की तरह ही होती है।
साल में दो बार छठ आने के बावजूद कई लोग चैत्र छठ के बजाय कार्तिक माह की छठ करते हैं। दरअसल कार्तिक माह में आने वाली छठ शीत ऋतु की शुरुआत में आती है, जिस वजह से दिन छोटे हो जाते हैं और उपवास रखना उतना मुश्किल नहीं होता है।
जबकि चैत्र छठ जिसे स्थानीय भाषा में 'चैती छठ' के नाम से जाना जाता है। चैत्र छठ के दौरान ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है और वातावरण में काफी गर्मी पड़ती है। ऐसे में चिलचिलाती धूप में लगातार 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखना थोड़ा मुश्किल होता है। जबकि कार्तिक मास में मौसम में ठंड दस्तक दे चुकी होती है और व्रत रखने वाले लोगों को उतनी दिक्कत नहीं आती है। हालांकि बहुत से लोग चैत्र महीने की छठ करते हैं।
चार दिवसीय छठ की महिमा
चार दिनों तक चलना वाला छठ का व्रत काफी सख्त और आध्यात्मिक माना जाता है। छठ पूजा के पहले दिन पवित्र नदी या कृत्रिम जलाशय में डुबकी लगाई जाती है। लोग नहाने और सूर्य देव की पूजा करने के बाद सात्विक भोजन खाते हैं, जिसमें चने की दाल, घीया और चावल प्रमुख माना जाता है।
इसके बाद छठ का दूसरे दिन 'खरना' जिसमें भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, शाम में धरती माता की पूजा करने के बाद खास प्रसाद ग्रहण किया जाता है। खरना में केला, गुड़ और चावल की खीर सबसे खास मानी जाती है, जिन्हें परिवार के सदस्यों और दोस्तों में बांट दिया जाता है।
छठ के तीसरे दिन 'संध्या अर्घ्य' जिसे सांझिया घाट के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन शाम के समय बड़ी संख्या में भक्त नदियों के किनारे इक्ट्ठा होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान छठ घाट पर लोकगीत बजाए जाते हैं। तीसरे दिन की रात कोसी नाम का एक रंगीन कार्यक्रम होता है।
गन्ने की डंडिया से एक छतरी बनाई जाती है और छतरी के अंदर जलते हुए मिट्टी के दीये प्रसाद से भरी टोकरियों के साथ रखे जाते हैं। छठ के चौथे और आखिरी दिन परिवार के सदस्य और दोस्त उगते सूर्य से पहले नदियों के किनारे जाते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस रस्म के बाद भक्त अपना व्रत तोड़ते हैं और सभी लोगों को छठ का प्रसाद देते हैं।
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