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अपनों से धोखा मिलने पर क्या करें? गीता के इस श्लोक में छिपा है सबसे बड़ा समाधान

Published: Wed, 04 Nov 2026 07:00 AM (IST)

अपनों से मिले धोखे से उबरने के लिए भगवद्गीता में गहरा समाधान छिपा है। गीता का श्लोक सिखाता है कि ...और पढ़ें

अपनों के धोखे से कैसे उबरें: भगवद्गीता का श्लोक (Picture Credit: AI Generated)

अपनों के धोखे से कैसे उबरें: भगवद्गीता का श्लोक (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. भगवद्गीता का श्लोक 6.5 धोखे से उबरने का समाधान।

  2. अपना उद्धार स्वयं करें, मन को नियंत्रित रखें।

  3. मानसिक शांति बनाए रखें, बदले की भावना से बचें।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जीवन में सबसे ज्यादा दुःख तब होता है, जब कोई अपना ही व्यक्ति आपका भरोसा तोड़ देता है। आप जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं वही धोखा दे जाए तो इंसान अंदर से टूटने लगता है। ऐसे में मन में कई सवाल उठते हैं और बार-बार उसी घटना के बारे में सोचकर व्यक्ति खुद को परेशान करता है।

कई बार गुस्सा, बदले की भावना और निराशा भी आपके मन पर हावी होने लगती है। वहीं कई बार मुश्किल समय में खुद को संभालने का कोई रास्ता नहीं मिलता है।

भगवत गीता में कई ऐसी सीख दी गई हैं जिनसे व्यक्ति को आगे बढ़ने और दूसरों के धोखे को भूलकर अपना अगला कदम बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है। गीता का एक श्लोक हमें सिखाता है कि दूसरों के व्यवहार के कारण अपनी मानसिक शांति और जीवन की दिशा को बिगाड़ना ठीक नहीं है। आइए जानते हैं कि अपनों से धोखा मिलने पर गीता का कौन सा श्लोक कारगर हो सकता है।

भगवद्गीता का कौन-सा श्लोक देता है धोखे से उबरने की सीख?

भगवद्गीता के छठे अध्याय के पांचवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्वयं का उत्थान करने और अपने मन को नियंत्रित रखने की सीख देते हैं।

श्लोक:

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

हिंदी अर्थ: मनुष्य को अपना उद्धार स्वयं करना चाहिए और स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु भी है।

धोखा मिलने पर इस श्लोक का क्या है जीवन में महत्व?

भगवान श्रीकृष्ण का यह श्लोक बताता है कि मुश्किल परिस्थितियों में व्यक्ति को सबसे पहले खुद को संभालना चाहिए। जब कोई अपना भरोसा तोड़ता है, तो हम अक्सर अपनी मानसिक शांति खो देते हैं। बार-बार उस घटना को याद करना, खुद को दोष देना और बदले की भावना रखना हमें भीतर से कमजोर कर सकता है।

गीता के इस श्लोक से मिलने वाली यह सीख बताती है कि किसी दूसरे व्यक्ति का व्यवहार हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन हम उस परिस्थिति में कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, यह हमारे हाथ में है। आपको दूसरों से धोखा मिले तब भी मन पर काबू बनाए रखना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि धोखा देने वाले व्यक्ति के व्यवहार को सही मान लिया जाए, लेकिन यदि आप दूसरों की गलती की सजा खुद को न दें तभी समझदारी है।

अपनों से धोखा मिलने पर क्या करें

  • जब कोई अपना धोखा देता है, तो व्यक्ति अक्सर खुद से सवाल करने लगता है कि आखिर उससे क्या गलती हुई थी। आपके लिए जरूरी है कि आप सबसे पहले स्वयं को दोष देना बंद करें।
  • धोखा मिलने के बाद गुस्सा आना स्वाभाविक है। कई बार मन में सामने वाले को उसी तरह दुख पहुंचाने का विचार भी आता है। आपके लिए बेहतर है कि आप मन में बदले की भावना न रखें।
  • भगवद्गीता की शिक्षा बताती है कि आप रिश्तों में प्रेम और विश्वास जरूर रखें, लेकिन अपनी समझ को कभी नजरअंदाज न करें। किसी के शब्दों से ज्यादा उसके व्यवहार और कर्मों को महत्व दें।
  • किसी के धोखे को बार-बार याद करने से मन में दुख और तनाव बढ़ सकता है। आप मानसिक शांति बनाए रखने की कोशिश करें।

भगवद्गीता का यह श्लोक हमें जीवन की एक महत्वपूर्ण बात समझाता है कि परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुकूल नहीं होती हैं, एल्कीन किसी भी परिस्थिति में संयम से काम लेना जरूरी होता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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