परिणाम की चिंता से लेकर फैसलों के डर तक: जब जिंदगी में कुछ समझ न आए, तो काम आएंगे गीता के ये 10 श्लोक
भगवद्गीता के 10 प्रमुख श्लोकों, जैसे 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' और 'यदा यदा हि धर्मस्य', की व्याख्या करता है। ये श्लोक निष्काम कर्म, ...और पढ़ें

आज की जिंदगी में भगवद्गीता के मायने (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवद्गीता के सबसे प्रमुख श्लोकों में कर्मण्येवाधिकारस्ते, यदा यदा ही धर्मस्य, वासांसि जीर्णानि, सर्वधर्मान्परित्यज्य और योगस्थः कुरु कर्माणि प्रमुख हैं।
ये सभी श्लोक निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता, ईश्वर शरणागति और समत्व भाव (समानता, समता, संतुलन या मन की स्थिर अवस्था) का सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं भगवद्गीता के 10 सबसे महत्वपूर्ण श्लोक के बारे में।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(भगवद्गीता 2.47)
अर्थात्- यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि परिणाम पर। यह श्लोक कर्मयोग पर आधारित है। आदि शंकराचार्य ने इस श्लोक में कहा है कि, निष्काम कर्म ही मोक्ष का सच्चा मार्ग है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान खुद प्रकट होते हैं। अगले श्लोक में वे कहते हैं कि, साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूं।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, आत्मा की अमरता को समझना बेहद जरूरी है। जिस तरह हम पुराने कपड़े बदलते हैं, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जीवन में सफलता मिले या असफलता, लाभ हो या हानि दोनों ही स्थितियों में मन को एक जैसा रखना ही सच्चा योग है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जब सब मार्गों से भ्रम हो, तो आखिर में बस भगवान को समर्पित हो जाओ। यह निराश का संदेश नहीं, बल्कि परम विश्वास का संदेश है। जब मनुष्य अपनी सभी कोशिशें से थक जाता है, तब ईश्वर की शरण ही सबसे बड़ा सहारा बनती है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, आत्मा न कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है। न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट हो जाने पर भी यह नहीं मारी जाती है।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, समबुद्धि से युक्त व्यक्ति पुण्य और पाप दोनों को इसी लोग में त्याग देता है। इसलिए तुम योग से जुड़ो। योग कर्म में कुशलता है।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। इसी तरह मुझ में लीन होकर तुम निश्चित रूप से मुझे हासिल कर लोगे।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि,ईश्वर को प्राप्त करने के कई मार्ग (ध्यान, कर्म और ज्ञान) हैं। कोई एक मार्ग दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है, हर एक व्यक्ति अपने स्वभाव के मुताबिक मार्ग चुन सकता है। यह गीता की सबसे उदार शिक्षाओं में से एक है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अपना धर्म गुण रहित होते हुए भी दूसरे के अच्छी तरह आचरित धर्म ही श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
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