विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

श्रीमद्भगवद्गीता के 2 श्लोकों में छिपा जीवन का गहरा रहस्य, श्रीकृष्ण ने बताया मोह-माया से मुक्ति का मार्ग

Published: Sat, 17 Oct 2026 07:30 AM (IST)

श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय के दो श्लोक संसार को एक उल्टे पीपल के पेड़ के समान बताते हैं। ये श्लोक ...और पढ़ें

संसार को उल्टे पीपल का पेड़ क्यों कहते हैं? (Picture Credit- AI Generated)

संसार को उल्टे पीपल का पेड़ क्यों कहते हैं? (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. संसार को उल्टे पीपल के पेड़ के समान बताया गया है।

  2. मोह-माया त्यागकर परमात्मा की शरण में जाने का मार्ग।

  3. अहंकार व आसक्ति से मुक्ति ही जीवन का सर्वोच्च ज्ञान।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में श्रीमद्भगवद्गीता को एक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें कई श्लोक हैं, जिनसे लोगों को जीवन में खास मार्गदर्शन मिलता है। ऐसा माना जाता है कि गीता में वर्णित श्लोकों को जीवन में अपनाने से सफलता मिलती है और रुके हुए काम पूरे होते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय में एक ऐसा श्लोक है, जिसमें संसार की तुलना एक उल्टे पीपल के पेड़ से की गई है। इस आर्टिकल में बताए गए गीता के 2 श्लोकों से यह संदेश मिलता है कि अगर हमें जीवन के दुखों और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना है, तो इस संसार के प्रति आसक्ति को छोड़कर विवेक, ज्ञान और भक्ति के साथ परमात्मा की शरण में जाना होगा। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं गीता के इन 2 श्लोकों के अर्थ के बारे में और ये श्लोक जीवन में क्या सीख देते हैं।

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का श्लोक 1)

अर्थ- श्रीद्भगवद्गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऊपर की ओर जड़ वाले और नीचे की ओर शाखाओं वाले इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहा गया है। इस पेड़ के पत्ते वैदिक मंत्र हैं। जो व्यक्ति इस पेड़ के रहस्य को जान लेता है, उसे ही वेदों का ज्ञाता कहा जाता है।

क्या सीख मिलती है?

यह श्लोक सिखाता है कि यह संसार एक उल्टे पेड़ के समान है, जिसकी असली जड़ें परमात्मा में हैं और शाखाएं भौतिक दुनिया में फैली हैं। सच्ची शांति पाने के लिए हमें केवल नश्वर चीजों में सुख ढूंढने के बजाय अपनी चेतना को अपनी जड़ों (परमात्मा) से जोड़ना चाहिए। इस परिवर्तनशील माया को समझकर परमात्मा से जुड़ना ही जीवन का सर्वोच्च ज्ञान है।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का श्लोक 5)

अर्थ- इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि जो व्यक्ति अहंकार और सांसारिक मोह-माया से मुक्त हो जाता है, तथा भगवान की भक्ति में लीन रहता है, वही व्यक्ति ईश्वर के अविनाशी परम धाम को प्राप्त करता है।

क्या सीख मिलती है?

गीता के इस श्लोक से सीख मिलती है कि जीवन में जो व्यक्ति झूठे अहंकार और मोह से मुक्त है, जिसने आसक्ति को जीत लिया है और सांसारिक कामनाएं छोड़ दी हैं; और जो निरंतर आत्म-ज्ञान में स्थित रहकर सुख-दुःख की स्थितियों में शांत रहता है, वही ज्ञानी मनुष्य जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करता है।

यह भी पढ़ें- कोई बार-बार कर रहा है आपका अपमान? भगवद्गीता का यह श्लोक सिखाएगा कैसे उठाएं सही कदम

यह भी पढ़ें- Bhagavad Gita Shlokas: रिश्तों की असल पहचान कराते हैं गीता के ये 5 श्लोक, जान लेंगे तो नहीं खाएंगे धोखा

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।