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    Surya Puja: सूर्यदेव की पूजा से जीवन में आएगी खुशहाली, आज के दिन करें इन स्तोत्र का पाठ

    By Vaishnavi DwivediEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Sun, 17 Dec 2023 08:36 AM (IST)

    Surya Puja रविवार का दिन भगवान सूर्य की पूजा के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यदेव की ऊर्जा से ही पूरे जगत का संचालन होता है। ऐसे मे ...और पढ़ें

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    Surya Puja: सूर्यदेव की पूजा से जीवन में आएगी खुशहाली

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Surya Puja: सूर्य देव की पूजा सनातन धर्म में बेहद पवित्र मानी गई है। रविवार के दिन भगवान सूर्य की पूजा का विधान है। कहा जाता है, वे अपने भक्तों में तेज और शक्ति प्रदान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यदेव की ऊर्जा से ही पूरे जगत का संचालन होता है।

    ऐसे में आज के दिन भगवान सूर्य नारायण को प्रसन्न करने के लिए कुछ स्तोत्र बताए गए हैं, जिनका पाठ बहुत ही कल्याणकारी माना गया है। तो आइए पढ़ते हैं -

    ॥ सूर्य रक्षा कवच॥

    याज्ञवल्क्य उवाच-

    श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।

    शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।1।

    देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।

    ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत् ।2।

    शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।

    नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर: ।3।

    ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।

    जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित: ।4।

    सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।

    दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय: ।5।

    सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।

    सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति ।6।

    ॥ श्री सूर्य अष्टकम ॥

    आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।

    दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोSस्तु ते ॥1॥

    सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।

    श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥2॥

    लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।

    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥3॥

    त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।

    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥4॥

    बृंहितं तेज:पु़ञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।

    प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥5॥

    बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् ।

    एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥6॥

    तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेज:प्रदीपनम् ।

    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥7॥

    तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।

    महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥8॥

    इति श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।

    सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडा प्रणाशनम् ।

    अपुत्रो लभते पुत्रं दारिद्रो धनवान् भवेत् ॥

    अमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने ।

    सप्तजन्मभवेत् रोगि जन्मजन्म दरिद्रता ॥

    स्त्री-तैल-मधु-मांसानि ये त्यजन्ति रवेर्दिने ।

    न व्याधि शोक दारिद्र्यं सूर्य लोकं च गच्छति ॥

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