Shri Krishna: कुबेर के पुत्रों को क्यों मिला था पेड़ बनने का श्राप, बाल गोपाल ने इस तरह किया उद्धार
हिंदू धर्म ग्रंथों में श्रीकृष्ण से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कई लीलाएं भी की हैं जिससे कुछ-न-कुछ सीख भी मिलती है। आज हम आपको भगवान श्रीकृष्ण के बालपन की एक ऐसी लीला के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके द्वारा उन्होंने कुबेर के पुत्रों को एक श्राप से मुक्ति दिलाई थी। तो चलिए जानते हैं यह कथा।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। श्रीमद्भागवतम् में कुबेर देव के पुत्रों नलकुबेर और मणिग्रीव से संबंधित एक कथा का वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार उन दोनों को उनके बुरे आचरण और घमंड के कारण एक श्राप का सामना करना पड़ा था। ऐसे में यह कथा व्यक्ति को सीख देने का काम भी करती है, कि किस तरह व्यक्ति का घमंड और गलत आचरण उसके लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है।
क्यों मिला था श्राप
श्रीमद्भागवतम् में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार कोषाध्यक्ष कुबेर के पुत्र होने के कारण नलकुबेर और मणिग्रीव को काफी घमंड था और वह भोग-विलास में लिप्त रहते थे। एक बार वह दोनों मदिरा पान कर रहे थे और स्त्रियों के साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे। उसी समय वहां से देवर्षि नारद गुजरे, जिन्हें देखकर स्त्रियां तो लज्जित होकर पानी से बाहर आ गईं, लेकिन कुबेर के पुत्रों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह उसी अवस्था में रहे।
दिया था ये श्राप
उन दोनों ने घमंड के चलते नारद जी का अभिनंदन भी नहीं किया। इस दोनों का यह व्यवहार देखकर नारद जी को अपना अपमान महसूस हुआ। तब क्रोध में देवर्षि नारद ने उन्हें श्राप दिया कि वह दोनों 100 दिव्य वर्षों तक वृक्ष बनकर खड़े रहेंगे। नारद जी का श्राप सुनते ही उन दोनों को पछतावा हुआ और वह क्षमायाचना करने लगे। तब नारद जी ने उनसे कहा कि तुम नंद महाराज के प्रांगण में वृक्ष बनोगे और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा।
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इस लीला से मिली मुक्ति
एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने एक मटकी फोड़ दी और अकेले में जगह पर मक्खन खाने लगे। कान्हा जी की इस शरारत की वजह से माता यशोदा ने उन्हें एक बड़ी-सी लकड़ी की ओखली से बांध दिया। जब कृष्ण जी ने खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगे, तो उन्होंने ओखली को घसीटना शुरू कर दिया।
इसके बाद वह आंगन में खड़े दो अर्जुन के पेड़ों के पास गए और उन्होंने दोनों पेड़ों के बीच में ओखली को फंसा दिया। इसके बाद बाल गोपाल ने पूरी ताकत के साथ रस्सी को खींचा, जिससे वह दोनों पेड़ गिर गए। पेड़ों के गिरते ही नलकुबेर और मणिग्रीव को नारद जी के श्राप से मुक्ति मिल गई। उन दोनों ने भगवान श्रीकृष्ण का आभार प्रकट किया और अपने धाम को लौट गए।
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